Chhattisgarh

पूजा करवाने का प्रथम अधिकार मां-बाप को मिला है : डॉ. विजयश्री

रायपुर । संसार में यश कीर्ति हर व्यक्ति पाना चाहता हैं यह यश कीर्ति मां-बाप के प्रति पूजा भाव रखने से मिलती है। मां-बाप ही जीवन को सम्पूर्ण ज्ञान के साथ जीवन जीने योग्य बनता है। हमारे संस्कार मां बाप की ओर से ही प्रदत्त होते हैं। हमारी प्रज्ञा भी उनके सानिध्य में विकसित होती है। वास्तव में इस सृष्टि के सभी व्यक्ति मां-बाप की ही रचना है। सृष्टि उनकी ओर से पोषित बच्चों से भरा पड़ा है। प्रेम दया, धर्म, करुणा सब कुछ हमने उनसे ही सिखा है और नाते – रिश्तों की पहचान उनसे ही जाना है यह हमारा जीवन मां-बाप की निकटता के बिना अधूरा है इसलिए स्वप्न में भी इनसे अलग होकर रहने की बात मन में आना नहीं चाहिए। डॉ. विजयश्रीजी मसा ने आज टैगोर नगर श्री लालगंगा भवन स्थित चातुर्मास प्रवचन श्रृंखला में उपस्थित धर्म श्रद्धालुओं को उपरोक्त संदेश दिए। उन्होंने बताया कि मां-बाप बच्चों के लिए साक्षात देवता से कम नहीं। उन्होंने बताया एक बार ब्रम्हा ने यह स्पर्धा करवाई कि कौन सबसे पहले सृष्टि का चक्कर लगा कर आ सकता है। जो पहले आएगा वह सर्वपूज्य हो जाएगा। सभी अपनी यात्रा में रवाना हो गये लेकिन गणेश अपने छोटे वाहन मूषक के कारण चिन्तित हो गए तो नारदमुनि ने उनसे उदासी का कारण पूछा और बताया कि सृष्टिकर्ता तो मां – बाप शिव पार्वती है अर्थात वही सम्पूर्ण सृष्टि हैं इसमें उदास होने की क्या जरूरत और गणेश को यह सही लगी। उन्होंने अपने माता-पिता शिव और पार्वती की परिक्रमा लगाकर ब्रहमा के सामने खड़े हो गए। ब्रहमा ने गणेश के बुद्धिचातुर्य की प्रशंसा की और उन्हें विजेता घोषित कर विश्व में प्रथम पूज्य-सर्वपूज्य बनाया इसीलिए प्रत्येक पूजा के पूर्व गणेश की पूजा या किसी कार्य को आरंभ को ही श्री गणेश करना कहा गया। यह मां-बाप की पूजा परिक्रमा का प्रभाव है। गुरूमां ने बताया कुछ लोगों को मां-बाप का स्नेह उनके नहीं होने से नहीं मिल पाता कभी उनके अनुभवों को जाने उनकी कमी को समझें ईश्वर के रूप में हमारे निकट हमेशा रहकर जो हमे जीवन जीना सिखाते है संसार के परिस्थितियों के अनुकूल बनाते है, सुखी, स्वस्थ् और आनन्दमय जीवन जीने का पाठ सिखाते है धर्म आचरण देते है ऐसा ईश्वर, ऐसा गुरु तो कहीं नहीं मिल सकता। अत: मां-बाप को ईश्वर तुल्य समझकर उनके प्रति पूजा व सम्मान का भाव रखना चाहिए इससे उसके जीवन में पूज्य पन, सम्मान की वृष्टि होती रहेगी और जीवन आनन्द और खुशहाल बना रहेगा।

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