Chhattisgarh

जीतेजी संसार के सामने आदर्श वने तो महान हो-सुधासागरजी

विजोलिया तीर्थ  (विश्व परिवार)। मरकर तो हर कोई देवता वन जाता है ऐसा कौन है जो जीते जी देवता वनकर संसार में आदर्श रूप मे पूजे गये वे और कोई नहीं मर्र्यादापुरूषोत्तम राम चन्दजी जो हजारों वर्ष पूर्व मोक्षधाम चले गए आज तक पूजे जा रहें है ऐसा उन्होंने क्या किया भगवान वनजाने के वाद हमारे हाथ में कुछ नहीं रहता सब प्रोटोकाल के अनुसार चलता है जो कुछ भी वताते वह नियत धारा है जो कुछ भी करना है पहले करों राम चन्दजी जो कुछ किया वह सारी दुनिया के लिए आदर्श है भगवान तो वहुत हुए लेकिन कुछ के प्रति आपकी आगाध्य श्राद्ध कैसे प्रकट हो जाती है कोई भी वड़े आदमी को देखकर मन ललचाता है यहाँ तक कि आप ये तक सोच लेते हैं कि किसी के तरफ आख उठाऊ तो इसका रोग दुर हो जाये ऐसा भावना मन में आती है कि भगवान ऐसा समर्थ दो कि आख ऊठाऊ तो केरोना भाग जाये दुनिया से कोरोना दुर हो जाये पर ऐसा नहीं हो रहा उक्त आशय के उद्गार तपोदय तीर्थ विजोलिया में विराजमान मुनिपुंगव श्रीसुधासागर जी महाराज ने प्रवचन मे कहे।
भारत वर्षिये दि जैन तीर्थ क्षेत्र कमेटी के राष्ट्रीय मुख्य पत्र तीर्थ वंदना के सह सम्पादक विजय जैन धुर्रा ने वताया कि मुनि संघ के सान्निध्य में तपोदय तीर्थ विजोलिया धर्म आराधना चल रहीं हैं ।
दुनिया मे रहकर जो देवता बन जाता वो तीर्थंकर होते है
उन्होंने कहा कि
देवता की परीभाषा-क्षरणागत वत्सल,जो दुनिया मे रहकर देवता बन गया वो तीर्थंकर होते है,जो संसार मे रहकर मे थे तब उनको भगवान मानते,देवता मानते है,जिनका नाम लेते ही अंधकार दुर हो जाते है वो अपने लिए जीते ही नहीं वो ये सोचते है कि मेरे पैरो से कोई जीव का घात नही हो जाये यह सब भगवान बनने के पहले का होना चाहिए
प्रसिद्धि मेरे भगवान की हो
उन्होंने कहा कि भगवान मुझे एक शक्ति दो कि आपका नाम हर आदमी के मुख पर हो,आपकी प्रभावना हो मेरी नहीं, प्रसिद्धि हो आपकी मेरी नहीं,हर आदमी के मुख पर आपका नाम हो, आपकी कृपा से मेरी आँखों मे आंसू नहीं ये भावना नहीं बल्कि संसार मे किसी की आंखों मे आंसू नहीं, यह भावना मुझे नहीं आपको जाने,मेरे धर्म की महिमा नहीं आपके धर्म की महिमा हो, इसलिए सुखी हूं आपकी कृपा से यह भावना नहीं आपकी कृपा से संसार सुखी हो
पाप के प्रमाण का उपदेश दिया जाता है
उन्होंने कहा कि दीक्षा के पहले दीक्षा के बाद का संकल्प कर रखा है तो आपका गुणस्थान नहीं बन पायेगा,निर्विकल्प्ता नहीं,मुझे कुछ करना ही नही,चलना ही नहीं है वर्धमान चारित्र के लिए सोचनाअनियत विहार हो अनियत सामायिक का आंनद ही अलग होता है हम धर्म का प्रमाण तो करते है लेकिन पाप का प्रमाण नहीं करते है जव कि पाप का प्रमाण करना चाहिए धर्म को अनियत कर दो,फेल होने वालों को पीछी-कमंडल दिये जाते वरना दीक्षा तो भगवान वनने के लिए होती हैं दीक्षा लेकर भरत चक्रवर्ती दीक्षा लेकर उठे ही नहीं केवल ज्ञान को प्राप्त कर लिया लेकिन शक्ति नहीं तो फिर करों चर्या करके को वहा कहा गया है ।धर्म करने के पहले धर्म को असीम कर दो,पाप को नीयत कर दो छोड़ दे।

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