Chhattisgarh

यात्रा अ से अं तक की : मुनिश्री संधानसागर जी महाराज

बाजना (विश्व परिवार)। संत शिरोमणि आचार्यश्री 108 विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य युवा तरूणाई के प्रखर वक्ता मुनिश्री 108 संधानसागर जी महाराज ने दिगम्बर जैन मंदिर बाजना में श्रद्धालुओं को संबांधित करते हुए कहा कि- एक-एक स्वर हमारे जीवन में संगीत के स्वर पैदा करने वाले हैं। पूज्य मुनिश्री जी ने क ककहरा की शुरूआत करने से पूर्व कहा कि व्यंजन खाने से पूर्व स्वर को दोबारा याद कर लें। एक नजर में पूज्य मुनिश्री जी ने अ से अं तक की यात्रा बहुत ही सुन्दर शब्दों में की। नैनागिर से वर्णमाला की प्रवचनमाला की शुरूआत हुई थीद्ध सिद्धक्षेत्र पर अविनश्वर-अक्षय पद की प्राप्ति हेतु, अरिहंतों के बारे में बताते हुए कहा कि- अरिहंतों को जानें, अरिहंतों को पूजो, अरिहंतों को ध्याओं एवं अरिहंतों की माने। -आ पर कहा कि आक्रोश का आना, आक्रोश में रहना, आक्रोश दिलाना एवं आक्रोश को सहना, तीन से बचकर चौथे उपया को अपनाना है, पर पूज्यश्री ने कहा कि इच्छाओं पर नियंत्रण करें, इस हेतु इन्द्रिय विजय हो, इरादा पक्का करो एवं इतिहास को जानो, आगे -ई पर ईष्र्या के कारण लक्षण, परिणाम बताकर ईष्र्या से बचने का उपाय बताया। इसके बाद मुनिश्री ने -उ पर कहा कि उत्साह, उल्लास, उमंग से जीने वाला ही उदासी दूर हो सकती है। बड़े -ऊ पर कहा उधम नहीं-ऊधम करो बनो, दंभी आदमी ऊल्लू बनना, ऊल्लू बनान, ऊल्लू सीधा करना इन चारों से बचना ही सही अर्थों में ऊ का अर्थ जानना है। बाजना में ऋ से प्रवचन शुरू करते हुए कहा कि ऋण लेना, ऋण देना, ऋण चुकाना एवं ऋण उतारना इसी के साथ पैसों का ही ऋण नहीं, पुण्य-पाप एवं कत्र्तव्य का भी ऋण होता है। ऋण् से ऋजुता का मतलब है कि सरल-सहज एवं निश्छल बनना, चार के प्रति सदैव निश्छल रहे, माता-पिता, गुरू, धर्मक्षेत्र एवं कल्याण मिद्ध, -ए की बात करते हुए कहा कि- एक वो जानो, एक को पूजो, एक को ध्याओं एवं एक की मानो, -ऐ पर कहा कि ऐब मत देखो, न ही ऐब निकालो, ऐब से बचो, एवं ऐब से बचाओ,-ओ से ओज पर पूज्य मुनिश्री जी ने कहा कि- कांतियुक्त बने, कान्तिमुक्त नहीं, एक शिव के समान है तो दूसरा शव के समान।-औ पर औचित्य, प्रसंग का ध्यान रखना बहुत जरूरी है। अंत में अं की बात पर कहा कि अंगों का पालन करो, अंग प्रदर्शन मत करो, अंगड़ाई लेंगे तथा अंग तोड़ मेहनत करना जरूरी है।
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