Chhattisgarh

अच्छे विचार हैं, सफलता का रहस्य : मुनिश्री संधानसागर जी महाराज

विदिशा (विश्व परिवार)। संत शिरोमणि आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य, युवा तरूणाई के प्रखर वक्ता मुनिश्री 108 संधानसागर जी महाराज ने अपनी ओजस्वी वाणी में अरहंत विहार के पाश्र्वनाथ जिनालय में उपस्थित श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा कि मन में उठने वाले विचारों से ही संसार का निर्माण होता है- जैसे विचार-वैसा संसार। पूज्य मुनिश्री जी ने कहा कि मन उठने वाले विचारों को चार प्रकार से बताया कि उन्हें कैसा नियंत्रण में करें। 4-डी की व्याख्या करते हुए कहा- बुरे विचारों को डायवर्ड करें, डायलूट करें, डिलीट करें एवं डिफीट करें। सामने पहाड़ आ जाये तो सिर नहीं फोड़ते साइड से अपना रास्ता निकालकर आगे बढ़ जाते हैं। गृहस्थ जीवन में भी डायवर्सन से काम चला सकते हैं। बुरे विचारों को डायलूट करो, कुछ विचारों को डिलीट करें एवं डिफीट दें। पूज्य मुनिश्री ने लता का उदाहरण देते हुए कहा कि- जैसा सहारा मिले लता का जीवन वैसा ही बन जाता है, कुयें के पाट का नहीं, खम्भे का सहारा लेना हितकारी है। पूज्य मुनिश्री जी ने कहा कि नकारात्मक सोच ही नरक हैं एवं सकारात्मक सोच ही स्वर्ग, इसलिये सदैव सकारात्मक सोचें। चार बातें जीवन में अच्छे विचारों हेतु जरूरत है- सकारात्मक सोच, खुद पर भरोसा, एकाग्रता एवं स्थिरता एवं एक-नेक लक्ष्य, इन सूत्रों को जीवन में उतारें।
विदिशा में हुई भव्य अगवानी-
संत शिरोमणि आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य मुनिश्री 108 दुर्लभसागर जी महाराज एवं मुनिश्री 108 संधानसागर जी महाराज का मंगल प्रवेश मध्यप्रदेश की विदिशा नगरी में हुआ। प्रात: काल से ही विदिशा का हर व्यक्ति मुनि द्वय के दर्शन करने को लालायित था। मुनिश्री का धर्मनाथ मंदिर में पादप्रक्षालन होने के बाद अरिहंत विहार में समाज ने भावभीना स्वागत किया। मुनिद्वय के प्रवचन हुए तत्पश्चात् आहारचर्या हुई। आहारोपरांत मुनिद्वय शीतलधाम बर्रो वाले बाबा चले गये। प्रचण्ड गर्मी में भी मुनिद्वय नहीं रूके। लोग रोड पर पांव नहीं रख पा रहे थे और मुनिद्वय पदविहार कर रहे थे, अद्भूत चर्या है। धन्य हैं ऐसे मुनिद्वय को।
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