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सात घंटे, एक अंग बचाया: AIIMS रायपुर के डॉक्टरों ने बार-बार होने वाले अस्थि कैंसर से पीड़ित युवती के लिए उम्मीद की नई कहानी लिखी

रायपुर (विश्व परिवार)। चिकित्सकीय उत्कृष्टता का एक उल्लेखनीय उदाहरण प्रस्तुत करते हुए, AIIMS रायपुर के डॉक्टरों ने 27 वर्षीय युवती की टांग को सफलतापूर्वक बचाया, जो बार-बार होने वाले अस्थि ट्यूमर से पीड़ित थी। इससे उसे सामान्य और आत्मनिर्भर जीवन जीने की नई उम्मीद मिली है। इससे पहले वह अन्यत्र दो असफल सर्जरी करवा चुकी थी, जिसके कारण उसे गंभीर दर्द, चलने में कठिनाई और स्थायी रूप से अंग खोने का खतरा था। रोगी में टिबिया की जायंट सेल ट्यूमर (GCT) का निदान हुआ था, जो आक्रामक रूप से दोबारा उभर आया था और आसपास के ऊतकों तक फैल चुका था। ट्यूमर को पूरी तरह निकालने और एक बड़े भार-वहन करने वाले अस्थि भाग के पुनर्निर्माण की दोहरी चुनौती को देखते हुए, AIIMS रायपुर के डॉक्टरों ने एक उन्नत और उच्च-जोखिम वाली लिम्ब-सेल्वेज सर्जरी की योजना बनाई, जो इस क्षेत्र में बहुत कम की जाती है। 7 घंटे तक चली इस जटिल सर्जरी को एक बहु-विषयक टीम ने अंजाम दिया। ऑर्थोपेडिक्स विभाग की टीम, डॉ. बिक्रम कर के नेतृत्व में, ने ट्यूमर को सावधानीपूर्वक निकाला, जिससे टिबिया में लगभग 18 सेमी का अस्थि अंतराल बन गया। इसके तुरंत बाद, प्लास्टिक सर्जरी विभाग की टीम, डॉ. जितेन मिश्रा के नेतृत्व में, ने विपरीत पैर से ली गई वेस्कुलराइज़्ड फिबुला बोन ग्राफ्ट का उपयोग करते हुए माइक्रोवेस्कुलर तकनीक से उस हिस्से का पुनर्निर्माण किया। पूरी सर्जरी एनेस्थीसिया टीम, डॉ. सरिता रामचंदानी के नेतृत्व में, की गई। यह सर्जरी अत्यंत सटीकता की मांग करती थी—जरा-सी चूक भी रक्त संचार को बाधित कर सकती थी, जिससे पुनर्निर्मित अस्थि और पूरा अंग दोनों खतरे में पड़ सकते थे। विशेषज्ञता और समन्वय के कारण वेस्कुलराइज़्ड बोन ग्राफ्ट पूरी तरह सफल रहा। तीन सप्ताह की पोस्ट-ऑपरेटिव देखभाल के बाद मरीज को स्थिर अवस्था में छुट्टी दे दी गई। चिकित्सकों को उम्मीद है कि वह शीघ्र ही आंशिक भार-वहन शुरू कर पाएगी और आगामी दो महीनों में स्वतंत्र रूप से चलने तथा दैनिक गतिविधियाँ करने में सक्षम हो सकेगी।
इस उपलब्धि की सराहना करते हुए लेफ्टिनेंट जनरल अशोक जिंदल (सेवानिवृत्त), कार्यकारी निदेशक एवं CEO, AIIMS रायपुर, ने समन्वित टीम प्रयास की प्रशंसा की और कहा कि यह सर्जरी संस्थान की उन्नत अंग-संरक्षण तकनीकों और रोगी-केंद्रित देखभाल के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाती है। यह ऐतिहासिक सर्जरी न केवल एक युवती की टांग बचाने में सफल रही, बल्कि उसे गरिमा, गतिशीलता और भविष्य भी लौटाया।

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