धर्म

71 वर्ष प्राचीन 41 फिट के मानस्तंभ के चारों श्रीजी का भव्य पंचामृत सानंद सम्पन्न

  • मान स्तंभ देखकर अहंकार, घमंड नष्ट होकर मन शांत निर्मल होता हैं

निवाई (विश्व परिवार) प्रथमाचार्य शांतिसागर की परम्परा के पंचम पट्टाधीश आचार्य वर्धमान सागर जी 32 साधुओं सहित निवाई विराजित हैं। वात्सल्य वारिधी आचार्य वर्धमान सागर के सानिध्य में 27 जनवरी को महिलाओं की कलशयात्रा से भूमिशुद्धि , याग मंडल विधान हुआ। 28 जनवरी को आचार्य निमंत्रण ,ध्वजवंदन , ध्वजारोहण मंदिरजी में कलशारोहण मानसतंभ में विराजित चार श्री जी का भव्य पंचामृत अभिषेक एवं शांतिधारा का धार्मिक अनुष्ठान पुण्यार्जक परिवारों द्वारा विधानाचार्य सुरेश के शास्त्री के निर्देशन मंत्रोच्चार से किया गया । मंदिर ममिति के मंत्री मोहित चंवरिया,पवन बोहरा अनुसार दिगम्बर जैन बड़ा मंदिर कमेटी के तत्वाधान में सकल दिगम्बर समाज निवाई के सहयोग से 27 एवं 28 जनवरी को आचार्य वर्धमान सागर जी को आचार्य निमंत्रण दिया गया। श्रीमती प्रेमदेवी ,चेतन ,महेश गिन्दौड़ी परिवार द्वारा ध्वजारोहण,मंदिर के शिखर पर नूतन कलशारोहण नरेंद्र, श्रीमती वीरमती चंवरिया परिवार द्वारा किया गया। 41 फिट ऊपर विराजित आदिनाथ भगवान का पंचामृत अभिषेक एवं शांतिधारा अरुण , अर्पित लटूरिया परिवार ने, चंद्रप्रभ भगवान का पंचामृत अभिषेक विनोद, महेंद्र सुनारा परिवार ने , शांतिधारा सुरेश, महेंद्र रवि पाटनी परिवार ने शांतिनाथ भगवान का पंचामृत अभिषेक एवं शांतिधारा बिष्णु, राहुल, बोहरा परिवार ने तथा महावीरस्वामी का पंचामृत अभिषेक एवं शांतिधारा सुशील नीरा जैन पाइप फैक्ट्री परिवार द्वारा किया गया। शांतिधारा का मंत्रोच्चार मुनि हितेंद्रसागर ने किया। बड़ा मंदिर कमेटी ने सभी पुण्यार्जक परिवारों का सम्मान कर बहुमान किया। मानस्तंभ क्यों बनाया जाता है इस बारे में आचार्य वर्धमानसागर के शिष्य मुनि हितेंद्रसागर ने बताया कि जैन मानस्तंभ जैन मंदिरों के सामने एक ऊंचा स्वतंत्र आध्यात्मिक स्तंभ होता है मान का आशय अहंकार ,घमंड होता है और स्तंभ का मतलब खंबा होता है ,अर्थात ऐसा खंबा जो मान और अहंकार को नष्ट करें वह मानस्तंभ होता है प्राचीन समय में तीर्थंकर भगवान के समवशरण के बाहर मान्स्तंभ होते थे , मान्यता है कि इसे देखकर भव्य जीवों का अहंकार ,घमंड नष्ट हो जाता है। वह विनम्र होकर भगवान के दर्शन करते हैं। मान स्तंभ के शीर्ष पर चारों दिशा में चार भगवान की प्रतिमा होती है निचले हिस्से में तीन सीढ़ियां होती है जो सम्यकदर्शन सम्यकज्ञान और सम्यकचारित्र का प्रतीक है। मानस्तंभ जैन वास्तु कला का एक हिस्सा है। मानस्तंभ देखकर मंदिर में प्रवेश के पूर्व मन शांत, नम्र, और निर्मल हो जाता है।
मान स्तंभ का धार्मिक इतिहास गुरुभक्त राजेश पंचोलिया इंदौर के अनुसार 71 वर्ष पूर्व प्रथमाचार्य शांतिसागर जी की मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परंपरा के प्रथम, द्वितीय और तृतीय पट्टाधीश मुनि अवस्था के मंगल पावन सानिध्य में 30 जनवरी 1955 माध शुक्ला सप्तमी विक्रम संवत 2010 वीर निर्वाण 2480 स्व रतनलालगिदौड़ी द्वारा अपने पिता स्व गजानंद की स्मृति में आचार्य कल्प वीरसागर , मुनि शिव सागर मुनि धर्मसागर,आर्यिका वीरमति , सिद्ध मति, सुमति मति, पार्श्व मति, शांति मति एवं क्षुल्लक पदम सागर जी 8 साधुओं की पावन उपस्थिति में 41 फीट के मानस्तंभ की प्रतिष्ठा सूरजमल प्रतिष्ठाचार्य द्वारा 30 जनवरी 1955 माघ शुक्ला सप्तमी विक्रम संवत 2011 को हुई। 41 फिट के संगमरमर के सफेद पत्थरों के मानस्तंभ पर 1008 श्री आदिनाथ,श्री चन्द्र प्रभु,श्री शांति नाथ ओर श्री महावीर स्वामी की चार प्रतिमाएं चारों दिशा में विराजित हैं। तथा धार्मिक अनेक चित्र अंकित है जिसमें सीता जी की अग्नि परीक्षा, षट् लेश्या, दिगंबर मुनियों के तप प्रभाव से सिंह और गाय एक साथ पानी पीते हुए, सम्राट चंद्रगुप्त के 16 सपने, संसार दर्शन मोह मधु बिंब , आदि का चित्रण किया गया हैं।

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