Chhattisgarh

जिस कार्य से स्व और पर को प्रसन्नता की हो अनुभूति वही पावन कार्य : आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज 

रायपुर (विश्व परिवार)। जगत पूज्य संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर महाराज ने बताया कि जिस कार्य से मेरे साथ अन्य को प्रसन्नता मिले वह पावन है। गरमी में चलने वाली गर्म लपटें भी वृक्ष की छांव में शीतल हो जाती है उसका उफान शांत हो जाता है ये वृक्ष की पावनता है। परस्पर सहयोग देकर प्रसन्न होना ही तो पावन कहलाता है।

ज्ञान साधना साहित्य के शिखर श्रमण आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज ने महाराष्ट्र के शिरपुर में उपस्थित समुदाय को सहयोग और प्रसन्नता की सीख देते हुये समझाया कि सूर्य के प्रचंड प्रताप से कुम्हला रहे पौधे की भी कांक्षा वांछा रहती है कि जल उपलब्ध करा दे किंतु वो अपनी इच्छा प्रगट नहीं कर सकता।दो छोटे बच्चे अपनी बालबुद्धि से पौधा को लोटा में भरकर कौतुलता वश जल डाल देते हैं। इस जल को पाते ही प्रचंड प्रताप से कुम्हला रही हरी पत्तियों में मानों उत्साह का संचार हो जाता है और ये पौधा बढ़कर विशाल वृक्ष हो गया।स्वयं शीतल है और छाया में आने वाले को शीतलता प्रदान  प्रसन्नता   देकर पावन हो जाता है।बच्चों ने पौधा को जल दिया,स्वयं प्रसन्न हुये और पाने वाला पौधा भी प्रसन्न, यही तो पावन कार्य है। गरमी में बहने वाली लपटों को भी वृक्ष शीतलता देता है, वे भी क्षण भर अपनी तपन को शांत कर शांति की अनुभूति करती हैं।सूरज के तेज प्रताप से चारों ओर गरमी झुलस रहे प्राणी वृक्ष की छांव में शीतलता पा जाते हैं,व्याकुल पथिक से भी मानों वृक्ष कह रहा हो छाया में बैठ कुछ देर विश्राम कर लो।वृक्ष छाया देकर प्रसन्न पथिक छाया पाकर प्रसन्न, यही पावन कार्य है।

आचार्य श्री विद्यासागर ने सहयोग प्रवृत्ति की प्रेरणा देते हुये कहा कि सहयोग से असंभव लगने वाले लक्ष्य भी सुगम हो जाते हैं। मंदिर में बजन वाली घंटियां और सजने वाली झल्लरियां देखने सुनने वाले को प्रसन्न कर देती हैं और बजाने वाला भी प्रसन्न हो जाता है। ये पावन कहलाता है। 

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