पदमपुरा (विश्व परिवार) । दीक्षा का अर्थ है इच्छाओं का दमन दीक्षा याने लंच और मंच का बदल जाना दीक्षा मतलब ड्रेस और एड्रेस का परिवर्तन हो जाना विचारों में क्रांति को दीक्षा कहते हैं आमूलचूल परिवर्तन को दीक्षा कहते हैं जैनियों की दीक्षा रागद्वेष निवृत्ति के लिए होती है दीक्षा पूर्व संस्कार को तोड़ने का नाम है, दीक्षा संसार से मुख्य मोड़ कर अंतर बुक दृष्टि हो जाने को कहते हैं अलौकिक ता से दूर आध्यात्मिक नगर के नजदीक रहना दीक्षा है यह मंगल देशना पदमपुरा में दीक्षा के अवसर पर आचार्यश्री वर्धमान सागर जी ने प्रगट की। राजेश पंचोलिया के अनुसार 1008 श्री वासु पूज्य भगवान के जन्म और तप कल्याणक दिवस पर आचार्य श्री ने दीक्षा दी।72 मनोरमा जैन का मनोरथ हुआ पूरा दीक्षा उपरांत हुई क्षुल्लिका श्री वासुपूज्य मति प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवती आचार्य श्री शांतिसागरजी की अक्षुण्ण मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परंपरा के पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने 16 फरवरी 2026 अतिशय क्षेत्र पदमपुरा में श्रीमती मनोरमा देवी संपतलाल अजमेरा बूंदी को भी क्षुल्लिका दीक्षा दी गई।इनका नूतन नाम क्षुल्लिका 105 श्री वासु पूज्यमति माताजी किया।सौभाग्यशाली परिवार की महिलाओं द्वारा चोक पूरण की क्रिया की गई।दीक्षार्थी ने आचार्य श्री ने दीक्षा की याचना की तथा आचार्य श्री एवम समस्त साधुओ दीदी भैया श्रावक श्राविकाओं तथा समाज से क्षमा याचना की।इस बेला में आचार्य श्री संघ गणिनी आर्यिका श्रीसरस्वती मति गणिनी आर्यिका श्री स्वस्ति भूषण माताजी सानिध्य में आचार्य श्री के द्वारा दीक्षार्थी के पंच मुष्ठी केशलोच किये गए तथा दीक्षा संस्कार मस्तक तथा हाथों पर किये गए। इसके बाद आचार्य श्री ने श्रीमती मनोरमा का दीक्षा उपरांत नूतन नाम क्षुल्लिका श्री वासु पूज्यमति किया गया। पुण्यार्जक अजमेरा परिवार बूंदी द्वारा पिच्छी कमंडल शास्त्र एवम कपड़े भेंट किये गए।आचार्य श्री मुनि श्री हितेंद्र सागर जी एवम् अन्य साधुओं ने दीक्षार्थी के केशलोचन किये।परिजनों एवम अन्य भक्त जिन्हें केशलोच झेलने का अवसर मिला। वह अपने को पुण्यशाली मान रहे थे। गुरुभक्त राजेश पंचोलिया इंदौर अनुसार इसके पूर्व आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने 42 मुनि,45 आर्यिका,2 ऐलक,16 क्षुल्लक ओर 13 क्षुल्लिका कुल 118 दीक्षा दी थी यह 119 वी दीक्षा है। प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी की परंपरा में किसी भी पूर्वाचार्य ने पदमपुरा में दीक्षा नहीं दी।पदमपुरा में पहली बार आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने दीक्षा दी।





