रायपुर (विश्व परिवार)। AIIMS रायपुर ने अपने संस्थान की पहली पीएचडी उपाधि प्रदान करते हुए एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक उपलब्धि हासिल की है। यह उपाधि सिकल सेल रोग (SCD) से स्वयं प्रभावित शोधार्थी तरुण साहू को प्रदान की गई। उन्होंने शरीर क्रिया विज्ञान विभाग से डॉ. रमंजन सिन्हा, प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, के मार्गदर्शन में “Effect of Short Term Slow Deep Breathing on Electrophysiological and Biochemical correlates of Neurocognition in Sickle Cell Disease” विषय पर शोध पूर्ण किया। यह अध्ययन स्लो डीप ब्रीदिंग—जो पारंपरिक भारतीय उपचार पद्धतियों में प्रचलित एक किफायती तकनीक है—के माध्यम से सिकल सेल रोगियों में संज्ञानात्मक हानि में सुधार की संभावनाओं पर केंद्रित था।
वयस्क सिकल सेल रोगियों पर वैश्विक स्तर पर अपने प्रकार का यह पहला अध्ययन बहु-विषयक दृष्टिकोण पर आधारित था। इसमें प्रो. मीनाक्षी सिन्हा (शरीर क्रिया विज्ञान), प्रो. एली मोहापात्रा, विभागाध्यक्ष जैव रसायन एवं डीन (शैक्षणिक), तथा प्रो. प्रीतम वासनिक (मेडिसिन) का महत्वपूर्ण योगदान रहा। अतिरिक्त शैक्षणिक सहयोग प्रो. अविनाश इंगले (शरीर क्रिया विज्ञान एवं डीन, परीक्षा) तथा डॉ. साई के. टिक्का, एसोसिएट प्रोफेसर, मनोचिकित्सा, AIIMS बीबीनगर, हैदराबाद ने सह-मार्गदर्शक के रूप में प्रदान किया।
अध्ययन को AIIMS नई दिल्ली और निम्हांस, बेंगलुरु जैसे राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों के विशेषज्ञों का मार्गदर्शन भी प्राप्त हुआ।
इस शोध में सिकल सेल रोग में संज्ञानात्मक कमी के मनोवैज्ञानिक, इलेक्ट्रोफिजियोलॉजिकल (EEG, दृश्य एवं श्रवण ERP) तथा न्यूरोकेमिकल पहलुओं का विश्लेषण किया गया। अध्ययन के परिणामों से स्पष्ट हुआ कि प्रतिदिन 20 मिनट का स्लो डीप ब्रीदिंग अभ्यास स्मृति, ध्यान, सजगता तथा संबंधित मनोवैज्ञानिक एवं न्यूरोकेमिकल मानकों में उल्लेखनीय सुधार लाता है।
यह पद्धति गैर-आक्रामक, कम लागत वाली तथा क्लिनिकल, सामुदायिक और घरेलू स्तर पर सरलता से लागू की जा सकने वाली है। इसके अतिरिक्त, यह अन्य तनाव एवं स्वायत्त तंत्रिका तंत्र से संबंधित न्यूरोकॉग्निटिव विकारों में भी उपयोगी सिद्ध हो सकती है। इस शोध की वैज्ञानिक गुणवत्ता राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय समीक्षित पत्रिकाओं में प्रकाशन तथा कॉपीराइट प्राप्ति से प्रमाणित होती है।
लेफ्टिनेंट जनरल अशोक जिंदल (सेवानिवृत्त), कार्यकारी निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी, AIIMS रायपुर ने मार्गदर्शक टीम और शोधार्थी को बधाई देते हुए कहा कि यह उपलब्धि न केवल संस्थान के लिए ऐतिहासिक है, बल्कि क्षेत्र में सिकल सेल रोग समुदाय के लिए दूरगामी सकारात्मक प्रभाव भी सुनिश्चित करेगी।





