अपने भीतर जीना सीखो,बाहर का जीवन आनंद नहीं दे सकता : आचार्यश्री विशुद्ध सागर जी महाराज

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रायपुर (विश्व परिवार)। रंगमंदिर गांधी मैदान में गुरुवार से जारी चातुर्मासिक प्रवचनमाला में आचार्यश्री विशुद्ध सागर जी महाराज ने कहा कि अपने भीतर जीना सीखो, बाहर का जीवन वाहवाही तो दे सकता है लेकिन आनंद नहीं दे सकता है। न किसी के बनो और किसी को अपना बनाओ, यही प्रभु महावीर का जीवन व संदेश है। सर्वप्रथम प्रभु ने जीवन जिया फिर संदेश दिया,जो जीवन जी लेता है वही संदेश दे सकता है,जो जीवन जी नहीं पाता वह क्या संदेश देगा। 

आचार्यश्री ने कहा कि जगत में संदेश देने की इच्छा रखते हो तो पहले जीवन जीने की इच्छा रखो। यदि विश्व को सत्य,अहिंसा,अचौर्य, ब्रह्मचर्य,अपरिग्रह का उपदेश देने की इच्छा मस्तिष्क में है तो इनके साथ जीवन जीने की आवश्यकता है। यही प्रवचनसार है,यही समयसार है और यही नियमसार है। सत्य को समझने की प्रज्ञा का बोध होता है तो जीव आनंद से पूरित हो जाता है। अपने शत्रु व मित्र आप ही हो,जब बाहर से खाली हो जाते हो तो आप अपने मित्र हो जाते हो और बाहर की सामग्री अपने भीतर रखना प्रारंभ करते हो तो आप अपने शत्रु हो जाते हो। यदि अपना शत्रु नहीं बनना हो तो बाहर के द्रव्य अपने भीतर लाने की कोशिश मत करो। आपके भीतर राग द्वेष का जन्म हुआ है लेकिन बाहर की कोई भी वस्तु का जन्म न आपके भीतर हुआ है,न होगा और न हो रहा है।

आचार्यश्री ने कहा कि जो आपके भीतर प्रवेश नहीं कर सकता है,उसे प्रवेश कराने की कोशिश ही कष्ट है। उसे अपना स्वीकारना ही कष्ट है,जो आपका हो नहीं सकता उसे अपना मानना ही कष्ट है। आप किसी के हो नहीं सकते हो,दूसरे का बनना ही कष्ट है,किंचित मात्र भी इसमें शंका नहीं। आप किसी का बनना स्वीकार मत करो,किसी को अपना बनाना स्वीकार मत करो, यही भगवान महावीर का जीवन है,यही प्रभु महावीर का संदेश है।

आचार्यश्री ने कहा कि शिखर अचल होता है लेकिन जिस ओर हवा होती है उस ओर ध्वजा होती है। भगवान महावीर ने ही नहीं,24 तीर्थंकरों ने सनातन काल से कहा है कि आपका चारित्र शिखर जैसा अचल होना चाहिए और अनेकांत स्यादवाद की पताका फहराना चाहिए। गुणों को देखने वालों की संख्या अधिक है, इसलिए छोटा सा अवगुण जल्दी दिख जाता है। जो गुण जानता है वही अवगुण देख पाता है। किसी भी  सभा में जाओ तो पैर आपके शिखर जैसे होने चाहिए,आवाज आपकी ध्वजा जैसी होनी चाहिए। कुछ वक्ता ऐसे होते हैं जिनके पैर ऐसे हिलते हैं जैसे ध्वजा हिलती है और वचन शिखर जैसे अचल होते हैं,निकलते ही नहीं है। इसलिए वचन होना चाहिए ध्वजा जैसे और पैर होना चाहिए शिखर जैसे,वही विश्व के श्रेष्ठ वक्ता हैं।

सम्यक आस्था,श्रद्धा और विश्वास के बगैर मोक्ष मार्ग संभव नहीं : मुनिश्री निर्ग्रन्थ सागर जी

मुनिश्री निर्ग्रन्थ सागर जी ने कहा कि जैन धर्म हमें बहुत गहराइयों तक ले जाता है,बहुत सूक्ष्मता की ओर ले जाता है। जिस जीव ने अपनी आत्मा से चारित्र का पालन किया है,सम्यक्त्व को प्राप्त किया है,मिथ्यात्व का त्याग किया है, रत्नत्रय की तरह से मंडित हुआ है, अपने परिणामों में विशुद्धता को बढ़ाकर कर्मों की छपणा की है और कर्मों का नाश किया है, वह भगवान बना है। ज्ञान की बुद्धि और ज्ञान की निर्मलता से मोक्ष की प्राप्ति होती है, लेकिन उसी को होती है जिसको इस पर श्रद्धा होती है। मोक्ष का रास्ता उसी के लिए है जिसके पास सम्यक आस्था है,जिनके पास श्रद्धा और विश्वास है। सम्यक्त्व से सहित नरक में जीना श्रेष्ठ है लेकिन सम्यक्त्व से रहित स्वर्ग में जीना श्रेष्ठ नहीं है। यदि श्रद्धा नहीं है तो पाषाण की प्रतिमा है,श्रद्धा नहीं है तो यह चर्म का शरीर है,यह कागज की किताब है। विश्वास है तो पाषाण में भी परमेश्वर नजर आते हैं,इस चर्म के शरीर में भी गुरु नजर आते हैं, इस कागज के पन्नों में भी भगवान की वाणी नजर आती है। इस बात का ज्ञान गुरु ही करा सकते हैं। डॉक्टर भी उसी रोगी का रोग ठीक कर सकता है जिस रोगी को डॉक्टर पर विश्वास है। गुरु का अनुशासन व आगम ज्ञान भी उसी शिष्य की उन्नति करा सकता है जिसे देव, शास्त्र व गुरु पर सच्चा विश्वास होता है।

धर्मसभा में बड़े दिगंबर जैन मंदिर मालवीय रोड के ट्रस्टी नरेंद्र जैन गुरुकृपा,अध्यक्ष संजय नायक,सचिव राजेश रज्जन,कोषाध्यक्ष लोकेश चंद्रकांत जैन, उपाध्यक्ष श्रेयश जैन,सदस्य हर्षिल जैन, गिरीश जैन, भरत भोरावत, सुरेंद्र जैन,प्रदीप पाटनी, राकेश बाकलीवाल, रितेश बाकलीवाल, पारस पापड़ीवाल, विनोद बड़जात्या, लविश जैन,अनिक जैन,नवीन मोदी, संजय जैन, पुष्पेंद्र जैन,देवकुमार जैन आदि प्रमुख रूप से उपस्थित थे। मंच का संचालन राजेश रज्जन ने किया। परम पूज्य चर्या शिरोमणि आचार्य गुरुवर 108 श्री विशुद्ध सागर जी महाराज के गुरुवार को पड़गाहन कर आहार कराने का परम सौभाग्य दिगंबर जैन बड़ा मंदिर मालवीय रोड मंदिर के ट्रस्टी,पथरिया यति सम्मेलन 2023 के अध्यक्ष समता कॉलोनी रायपुर निवासी नरेंद्र कुमार जी-अरूणा जी,योगेन्द्र कुमार जी-श्रद्धा जी रितेश कुमार जी-रजनी जी अतेंद्र जी, अर्हम जी, अक्षत जी जैन ( गुरुकृपा परिवार ) परिवार को प्राप्त हुआ।

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