सत्य को स्वीकार किए बगैर स्वयं को सत्य समझने वाला संसार का सबसे पतित प्राणी है : आचार्यश्री विशुद्ध सागर जी महाराज

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रायपुर (विश्व परिवार)। रंगमंदिर गांधी मैदान में शुक्रवार को आचार्यश्री विशुद्ध सागर जी महाराज ने मंगल देशना में कहा कि संसार की सबसे बड़ी विडंबना है कि जो सत्य को जाने बिना, सत्य को समझे बिना,सत्य को स्वीकार किए बिना अपने आपको सत्य समझ रहा है,वह संसार का सबसे पतित प्राणी है। जिसे सत्य का ज्ञान और विवेक नहीं फिर भी अपने आपको सत्य मानता है,उसे समझना बहुत कठिन है। जिस दिन सत्य के नजदीक व पास पहुंचेगा उस दिन व्यक्ति को बोध होगा कि मैं कितना सत्य में जी रहा था ? जिसे आज तक धर्म मानकर चला है व्यक्ति,विश्वास मानो जिस दिन सत्य का बोध होगा उस दिन वह व्यक्ति अपने पूरे जीवन को अधरमय मान लेगा। 

आचार्यश्री ने कहा कि किसी ने क्रिया में धर्म देखा,किसी ने भाव में धर्म देखा, किसी ने संप्रदाय में धर्म देखा, किसी ने अपने कुटुंब की परंपरा में धर्म देखा, किसी ने अपने प्रांत और देश की परंपरा में धर्म देखा और इस धर्म के पीछे में कोई नवीन आदमी आ गया तो फटकार कर भगा दिया। जिस दिन ज्ञान हुआ कि धर्म तो भावों की निर्मलता है,धर्म तो परिणामों की पवित्रता है,धर्म तो प्राणी मात्र के प्रति समभाव है,उस दिन मालूम चला कि हमने कितने लोगों को मंदिर के बाहर भगाया था। हमने कितने लोगों को घर के बाहर निकाला था। धर्म का बोध होगा तो आप समझोगे कि जब घर में उगे पौधे को नहीं उखाड़ सकते हो तो पत्नी के गर्भ में पल रहे शिशु का कैसे नाश कर सकते हो ?

आचार्यश्री ने कहा कि मान के मद में फूलकर, प्रतिष्ठा का भूत चढ़ाकर, ख्याति लाभ में डूबा हुआ,धर्म के मर्म को समझ नहीं सकता। कितनो को  मालूम था कि अकौवे के पौधे में महावीर स्वामी विराजमान थे। जिस दीपक की ज्योति को देख रहे हो उसमें भविष्य का तीर्थंकर विराजमान हो सकता है। वर्तमान के भगवान को समझने के लिए वर्तमान की आंखें काफी है,भविष्य के भगवंतों को समझने के लिए कैवल्य ज्ञान की आंख चाहिए। कैवल्य ज्ञान से जानने लग गए तो यदि चींटी भी काट रही हो तो उसे खींचोगे नहीं,क्योंकि चींटी अल्प समय में निर्वाण को प्राप्त करने वाला जीव है। कैवल्य ज्ञान से जिसने जान लिया कि वर्तमान में चींटी की पर्याय वाला जीव भविष्य का  भगवान है,यदि आपने किसी जीव को कष्ट पहुंचाया हो तो उससे क्षमा याचना करते रहिए। 

आत्म कल्याण करना चाहते हो तो निज को निहारो :  मुनिश्री यत्न सागर जी

मुनिश्री यत्न सागर जी ने कहा कि क्रोध प्रीति को नष्ट करता है,मान विनय को नष्ट करता है,मायाचारी करने से मित्रता नष्ट होती है, लोभ सब कुछ नष्ट कर देता है। जिसकी आत्म कल्याण की दृष्टि होती है वह पर को नहीं निहारता है, निरंतर निज को ही निहारता रहता है। आपने पलक उठाकर दूसरों को निहारा है तो उस क्षण आपको कर्म का बंध हुआ है, आयु क्षीण हुई है,इसलिए पर को नहीं निजी को निहारो। निज की आत्मधारा में डूबना चाहते हो तो निज की अखंड धारा में रहो। व्यक्ति को पुण्य की चिंता में विपरीत विचार आते हैं। जो व्यक्ति दूसरों पर दोषारोपण करता है वह नियम से पुण्य क्षीण है। जो उत्साही होता है वही आत्म सिद्धि को प्राप्त कर पाता है। उत्साहहीन कभी भी सफलता को प्राप्त नहीं होता,लोक में भी प्रसिद्धि चाहिए तो आज सिद्धि को प्राप्त करो। जो आत्मानुशासक है वही सच्चा शासक हो सकता है,जिसका निज पर ही कंट्रोल नहीं है,वह क्या दूसरों पर नियंत्रण कर पाएगा। संसार की विचित्र दशा है,कब किस पर कैसे विश्वास करना है,इसका निर्णय बहुत जरूरी है। आपका विश्वास ही आपको परमात्मा बना सकता है, आपका विश्वास ही आपको नरक के द्वार भेज सकता है। किसके साथ कैसा रहना है इस पर बहुत ध्यान देना होगा।

शनिवार सुबह आचार्यश्री महावीर स्तूप को पुष्पों से करेंगे अभिमंत्रित

धर्मसभा में बड़े दिगंबर जैन मंदिर मालवीय रोड के ट्रस्टी नरेंद्र जैन गुरुकृपा,अध्यक्ष संजय नायक,सचिव राजेश रज्जन,कोषाध्यक्ष लोकेश चंद्रकांत जैन, उपाध्यक्ष श्रेयश जैन,सदस्य हर्षिल जैन, गिरीश जैन, भरत भोरावत, सुरेंद्र जैन,प्रदीप पाटनी, राकेश बाकलीवाल, रितेश बाकलीवाल, पारस पापड़ीवाल, विनोद बड़जात्या, लविश जैन,अनिक जैन,नवीन मोदी, संजय जैन, पुष्पेंद्र जैन,देवकुमार जैन,ललित पटवा,विभिन्न प्रांतों से आए गुरुभक्त 

आदि प्रमुख रूप से उपस्थित थे। मंच का संचालन राजेश रज्जन ने किया। शनिवार को सुबह 10:30 बजे आचार्यश्री विशुद्ध सागर जी महाराज कोतवाली चौक स्थित जैन कीर्ति स्तम्भ महावीर स्तूप को पुष्पों से अभिमंत्रित करेंगे।

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