(विश्व परिवार)। बूंद–बूंद से घड़ा भरता है यह बचपन से सुनते आए हैं पर टैप नलों से पानी भरने वाली पीढ़ी संचय के महत्व को महसूस नहीं कर सकी है। यह उदासीनता पानी के संदर्भ में ही नहीं बल्कि सभी उपलब्ध संसाधनों के साथ रही है। हैदराबाद में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देशवासियों से ऊर्जा बचत और ऊर्जा स्वावलंबन को लेकर जो आह्वान किया है वह वर्तमान वैश्विक चुनौतियों से निपटने में सहायक तथा हमारी समृद्धि को सुनिश्चित करने का मंत्र भी है। यह आह्वान निर्भरता से आत्मनिर्भरता की ओर देश को ले जाने के संकल्प को ही प्रतिध्वनित करता है। विकसित भारत-2047 का लक्ष्य ऐसे छोटे किन्तु प्रभावी कदमों के सहारे ही प्राप्त होगा। श्री मोदी के आह्वान को सीमित संदर्भों और राजनीतिक विमर्श से कहीं आगे जाकर देखने की जरूरत है।
प्रतीकात्मक नहीं, प्रभावी है आह्वान
स्वतंत्रता के बाद के दशकों में विकास के पैमाने पर देश लगातार आगे बढ़ा है और आम देशवासी संसाधनों का बेहतर लाभ भी उठा रहा है। इन सबके पीछे तेज आर्थिक विकास और उसके पीछे है ऊर्जा उपलब्धता। लगभग डेढ़ अरब की आबादी वाले देश की ऊर्जा उपलब्धता को सुनिश्चित करने में बड़े आर्थिक भार और कूटनीतिक तैयारी करनी पड़ती है। सामान्य समझ है कि ऊर्जा आयात कर समृद्धि की राह मुश्किल ही रहेगी। ऐसे में प्रधानमंत्री का ऊर्जा बचत के साथ ही सौर ऊर्जा समेत अन्य ऊर्जा स्रोत के विकास पर बल दिया जाना आम नागरिकों को संभलने और सजग होकर अपनी भूमिका तय करने का संदेश है। बचत सही मायनों में संसाधनों के अधिकतम और सार्थक उपयोग को बढ़ावा देता है जो अंततः उपलब्ध ऊर्जा से उत्पादकता को बढ़ाने वाला है।
आपदा को अवसर बनाने का संदेश
बदलते वैश्विक समीकरणों और परंपरागत ऊर्जा विशेषकर पेट्रोलियम पदार्थों की छीना – झपटी के बीच ऊर्जा स्वावलंबन एक बेहतर और दूरगामी विकल्प है। ऊर्जा खर्च करने में संयम बरतने की अपील सिर्फ तात्कालिक और संभावित ऊर्जा संकट से निपटने की युक्ति नहीं । प्रधानमंत्री इस वैश्विक आपदा में देश को ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रत्येक नागरिक की भूमिका बढ़ाने का आह्वान कर रहे हैं। बचत का विचार ऊर्जा संकट के कारण नहीं है, यह तो वैश्विक संकट की पृष्ठभूमि में देश को तैयार होने का बेहतर अवसर है। सजग समाज वो है जो भविष्य की चुनौतियों को भांपकर निपटने के लिए तैयार हो।
संस्कृति में शामिल मितव्ययिता
मितव्ययिता या बचत किसी संकट से बचने का विकल्प नहीं यह तो भारतीय जीवन शैली का हिस्सा रहा है। संसाधनों के अधिकतम उपयोग की सीख जीवनचर्या में शामिल रही है। अन्न के हर एक दाने का सम्मान हो या एक–एक बूंद पानी के समुचित उपयोग की सीख। देश की संस्कृति में गृहणियों की बचत से संग्रहित धन परिवार की आपातकालीन जरूरतों में हमेशा बड़ी भूमिका निभाते आया है। इतना ही नहीं वर्ष 2008 की वैश्विक मंदी संकट के दौर में भारत बेअसर रहा जिसके पीछे भारतीय परिवारों में बचत की प्रवृत्ति ने बड़ी भूमिका निभाई। असल में उपयोग और सदुपयोग के बीच कई बार हम अंतर नहीं करते हैं जबकि हमारी संस्कृति में हर संसाधन के संयम से उपयोग पर बल दिया गया है।
क्षणशः कणश्चैव विद्यामर्थ च साधयेत् । क्षणत्यागे कुतो विद्या कणत्यागे कुतो धनम ।। यानी जैसे–जैसे क्षण और कण जुड़ते हैं, वैसे –वैसे विद्या और धन बढ़ता है और यदि इनकी उपेक्षा करेंगे तो न विद्या मिलेगी और न धन।
निर्भरता से आत्मनिर्भरता की ओर
देश की ऊर्जा जरूरतों में जीवाश्म ईंधन का हिस्सा 80 प्रतिशत से अधिक है। पेट्रोलियम पदार्थों एवं प्राकृतिक गैस के आयात पर खर्च का हिसाब लगभग 18 लाख करोड़ रूपए होता है जो हमारी सकल घरेलू उत्पाद का 5 प्रतिशत के करीब है। इस पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री का नवीकरणीय ऊर्जा की दिशा में तेजी से आगे बढ़ने तथा ऊर्जा की संयमित खपत का आह्वान एक दूरदर्शी नेतृत्व को दर्शाता है। ऊर्जा की खपत एक ओर जहाँ हमारे विकास का आधार और समृद्धि का पैमाना माना जाता है वहीं बढ़ती आबादी की ऊर्जा जरूरतों की पूर्ति करना एक बड़ी चुनौती भी है। ऐसे में विदेशों पर ऊर्जा निर्भरता के स्थान पर आत्मनिर्भरता का संकल्प हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए बेहतर भविष्य का निर्माण करेगी।
छोटे कदमों से मिलेगी बड़ी मंजिल
निर्बाध ऊर्जा आपूर्ति करना जहाँ देश के कर्णधारों का दायित्व है वहीं आम नागरिक की भूमिका भी सजग प्रहरी की होनी चाहिए। जीवाश्म ईंधन के विकल्प के रूप में सौर ऊर्जा की दिशा में देश तेजी से बढ़ रहा है । जीवाश्म ईंधन की सीमाओं तथा नवीकरणीय ऊर्जा से उत्पादित विद्युत की बड़ी मात्रा में भंडारण की चुनौतियों को जानते हुए उपलब्ध ऊर्जा का समुचित और बेहतर उपयोग ही इसे सर्व सुलभ बनाए रख सकता है। कुछ छोटे–छोटे उपाय देश की बड़ी जरूरत को पूरा करने में सहायक हो सकते हैं। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने ऊर्जा बचत के छोटे और व्यवहारिक उपाय बताएं हैं वे बड़े कारगर तथा हमारी संस्कृति में शामिल रहे हैं। प्रधानमंत्री के आह्वान के बाद देश के कई प्रदेशों में छोटे–छोटे प्रयास शुरू हो चुके हैं। छत्तीसगढ़ में भी मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कुछ तात्कालिक उपाय की घोषणा की है जिसमें सभी शासकीय गाड़ियों को इलेक्ट्रिक वाहन से बदली जाएंगी।
संकल्प से सिद्धि का मंत्र
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के लोगों को संकल्प से सिद्धि का मंत्र दिया है। सामाजिक ,आर्थिक या कूटनीतिक क्षेत्र में यदि देश को आगे जाना है तो इन सभी के लिए ऊर्जा पहली जरूरत है और इसमें ऊर्जा स्वावलंबन सबसे बड़ी चुनौती। संसाधनों की बचत के रूप में नागरिकों के छोटे प्रयास भारत जैसे सबल और सामर्थ्यवान देश को आत्मनिर्भर और विकसित राष्ट्र बनाने में बहुत अहम होंगे। बचत कोई अल्पकालीन व्यवहार नहीं संस्कार का हिस्सा बने तो समृद्धि के संकल्प की सिद्धि दूर नहीं है।








