छत्तीसगढ़

एम्स रायपुर में जीनोमिक निदान पर राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित

रायपुर (विश्व परिवार)। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), रायपुर के साइटोजेनेटिक्स विभाग द्वारा एनाटॉमी विभाग के सहयोग से “फ्लोरोसेंट इन सिटू हाइब्रिडाइजेशन में संवेदनशीलता एवं कौशल विकास” विषय पर सतत चिकित्सा शिक्षा कार्यक्रम एवं राष्ट्रीय स्तर की कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य उन्नत आणविक साइटोजेनेटिक तकनीक फ्लोरोसेंट इन सिटू हाइब्रिडाइजेशन के संबंध में जागरूकता बढ़ाने तथा इसके व्यावहारिक उपयोग और कौशल को विकसित करना था।
कार्यक्रम का उद्घाटन लेफ्टिनेंट जनरल अशोक जिंदल (सेवानिवृत्त), कार्यपालक निदेशक, एम्स रायपुर द्वारा किया गया। प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए उन्होंने इस पहल को संस्थान की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक मील का पत्थर बताया। उन्होंने संस्थान में उन्नत जीनोमिक निदान सुविधाओं की स्थापना एवं सुदृढ़ीकरण तथा इस क्षेत्र में विशेषज्ञता और कौशल विकास के महत्व पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम के वैज्ञानिक सत्र में सेंटर ऑफ ह्यूमन जेनेटिक्स, बेंगलुरु से आमंत्रित विशेषज्ञ डॉ. जयराम ने फ्लोरोसेंट इन सिटू हाइब्रिडाइजेशन के सिद्धांत, कार्यप्रणाली एवं नैदानिक उपयोगिता पर व्याख्यान दिया। उन्होंने विभिन्न विशिष्ट गुणसूत्रीय एवं आनुवंशिक असामान्यताओं की पहचान में इस तकनीक की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि ऐसे जटिल मामलों में यह तकनीक विशेष रूप से उपयोगी है, जहां पारंपरिक जांचों से पर्याप्त एवं स्पष्ट निदान प्राप्त करना संभव नहीं हो पाता।
प्रो. डॉ. मनीषा बी. सिन्हा, एम्स रायपुर ने “कैरियोटाइपिंग के बाद फ्लोरोसेंट इन सिटू हाइब्रिडाइजेशन की आवश्यकता क्यों और कहाँ होती है” विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि पारंपरिक कैरियोटाइपिंग संख्यात्मक तथा बड़ी संरचनात्मक गुणसूत्रीय असामान्यताओं की पहचान के लिए एक महत्वपूर्ण जांच है, जबकि फ्लोरोसेंट इन सिटू हाइब्रिडाइजेशन किसी विशिष्ट गुणसूत्र अथवा गुणसूत्रीय क्षेत्र के संबंध में लक्षित एवं अधिक विशिष्ट जानकारी प्रदान करता है, जिसे नियमित कैरियोटाइपिंग से स्पष्ट रूप से पहचानना संभव नहीं हो सकता।
डॉ. सिन्हा ने विभिन्न नैदानिक रूप से महत्वपूर्ण मामलों का प्रस्तुतिकरण करते हुए यह समझाया कि कैरियोटाइपिंग के बाद किन परिस्थितियों में उपयुक्त फ्लोरोसेंट इन सिटू हाइब्रिडाइजेशन जांच-सूचक का चयन किया जाना चाहिए। केस-आधारित चर्चा के माध्यम से उन्होंने बताया कि पारंपरिक साइटोजेनेटिक्स एवं आणविक साइटोजेनेटिक तकनीकों का समन्वय नैदानिक सटीकता बढ़ाने तथा जटिल गुणसूत्रीय असामान्यताओं के मूल्यांकन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
कार्यक्रम में फ्लोरोसेंट इन सिटू हाइब्रिडाइजेशन के विभिन्न नैदानिक उपयोगों पर भी विस्तार से चर्चा की गई। इनमें एनीयूप्लॉइडी, सूक्ष्म विलोपन, द्विगुणन, मार्कर गुणसूत्र तथा अन्य गुणसूत्रीय असामान्यताओं की पहचान प्रमुख रही। विशेषज्ञों ने आधुनिक जीनोमिक निदान के क्षेत्र में इस तकनीक को एक महत्वपूर्ण आणविक साइटोजेनेटिक तकनीक के रूप में रेखांकित किया।
इस सतत चिकित्सा शिक्षा कार्यक्रम एवं कार्यशाला ने चिकित्सकों, विद्यार्थियों तथा प्रयोगशाला विशेषज्ञों को फ्लोरोसेंट इन सिटू हाइब्रिडाइजेशन की व्यावहारिक उपयोगिता समझने और इस उन्नत नैदानिक तकनीक में अपने कौशल को विकसित करने के लिए एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक मंच प्रदान किया। राष्ट्रीय स्तर की इस कार्यशाला में देश के विभिन्न हिस्सों से आए चिकित्सकों, विशेषज्ञों एवं संबंधित क्षेत्र के पेशेवरों ने सहभागिता की। कार्यक्रम के दौरान ज्ञान के आदान-प्रदान, व्यावहारिक प्रशिक्षण एवं कौशल विकास पर विशेष जोर दिया गया।
यह पहल एम्स रायपुर में जीनोमिक एवं आणविक साइटोजेनेटिक निदान सुविधाओं को सुदृढ़ करने तथा चिकित्सा आनुवंशिकी के क्षेत्र में उन्नत नैदानिक क्षमताओं को विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

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