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नवरात्रि में ‘न्याय यात्रा’ पर रोक, D.Ed अभ्यर्थी बोले-आस्था से खिलवाड़

रायपुर (विश्व परिवार)। 2300 सहायक शिक्षक पदों पर नियुक्ति की मांग को लेकर 86 दिनों से आमरण अनशन पर बैठे डीएड अभ्यर्थियों ने आज नवरात्रि और हिंदू नववर्ष पर मां शीतला न्याय कलश यात्रा निकाली, जिसे पुलिस ने धरना स्थल के गेट पर ही रोक दिया। यह यात्रा तूता धरना स्थल से न्याय की मांग को लेकर निकाली जा रही थी, जिसे आगे बढ़ने से पहले ही रोक दिए जाने पर अभ्यर्थियों में नाराजगी देखने को मिली।
अभ्यर्थियों ने राज्य सरकार पर सवाल उठाते हुए कहा कि क्या बीजेपी सरकार अब हिंदू आस्था पर भी लाठी चलाएगी। यह यात्रा शांतिपूर्ण तरीके से निकाली जा रही थी, लेकिन प्रशासन ने इसे जबरन रोक दिया। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे 2300 सहायक शिक्षक पदों पर नियुक्ति की संवैधानिक मांग को लेकर लंबे समय से आंदोलन कर रहे हैं। वहीं डीएड अभ्यर्थी पिछले 86 दिनों से आमरण अनशन पर बैठे हैं, लेकिन उनकी मांगों पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। शिक्षा विभाग न तो हाईकोर्ट और न ही सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन कर रहा है, जिससे योग्य अभ्यर्थियों का भविष्य अधर में लटका हुआ है।
हाथ में न कोई पोस्टर ना बैनर ख़ाली पैर कलश लेकर निकले अभ्यर्थियों को पुलिस ने बैरिकेड लगाकर रोक लिया। पांच घंटों से कड़कती धूप में अभ्यर्थी खुले आसमान के नीचे बैठे रहे। शासन-प्रशासन की इस कार्रवाई से आहत अभ्यर्थियों ने कहा कि ये आस्था से खिलवाड़ है। चैत्र नवरात्रि के पवित्र अवसर पर जब पूरा हिंदू समाज मां दुर्गा के नौ रूपों की आराधना में लीन है और मां शीतला के चरणों में कलश चढ़ाकर सुख-समृद्धि की कामना करता है, ठीक उसी समय छत्तीसगढ़ की बीजेपी सरकार ने हिंदू धर्म की इस पवित्र परंपरा पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिया।
इस कलश यात्रा में जशपुर, बलरामपुर, सुकमा, बस्तर, बीजापुर, कोरिया, नारायणपुर आदि जिलों से आए थे। हाथों में कलश, माथे पर तिलक, भक्ति भाव से मंत्रोच्चार करते हुए वे मां से बस इतनी मन्नत मांग रहे थे कि उनकी वर्षों की मेहनत और पढ़ाई का फल उन्हें मिले, उनके परिवारों का भविष्य संवरे। पुलिस बल की भारी तैनाती, बैरिकेडिंग और लाठी-डंडों की धमकी से कलश यात्रा को धरना स्थल के गेट पर ही रोक दिया गया।
अभ्यर्थियों ने कहा, क्या अब हिंदू धर्म के सबसे पवित्र नवरात्रि पर्व पर भी बिना अनुमति के कलश यात्रा निकालना अपराध हो गया है? अगर कोई राजनीतिक पार्टी की रैली होती, चुनावी सभा होती या कोई धार्मिक जुलूस किसी संगठन का होता, तो नियम-कानून की बात कहां चली जाती है? लेकिन जब पढ़े-लिखे, संवैधानिक अधिकार के लिए संघर्षरत युवा मां के नाम पर शांतिपूर्ण कलश यात्रा निकालते हैं, तो तुरंत पुलिस का पहरा लगा दिया जाता है। यह दोहरा मापदंड नहीं तो और क्या है?
अभ्यर्थियों का स्पष्ट कहना है कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेशों के बावजूद 2300 पद खाली पड़े हैं, जबकि हजारों युवा भूखे-प्यासे, परिवार की उम्मीदों पर बैठे न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। यह केवल नौकरी की मांग नहीं, बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार, शिक्षा के क्षेत्र में योग्यता का सम्मान और हिंदू समाज के युवाओं के साथ न्याय का सवाल है।

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