Blog

लठ मार होली-स्व रचित डॉ प्रभा शुक्ला

 (विश्व परिवार) लठ मार होली
बरसाने की है परंपरा निराली
लाठी चलाती गौरी आई होली।

बरसाने के लोग आते हैं
नन्द भवन अपने प्यारे जमाई,
बाबू को निमंत्रित करने,
आदर विनय से करते निवेदन।

ओ भैया, ओ कन्हैया ,
लाला प्यारे छलिया,
कुंवर साहब आप हमारे,
आ जाना बरसाने, राधा
बैठी बाट निहारे।

साथ में आती हैं सखियां,
प्यारी सुंदर घुंघट वालियां,
लाती मिष्ठान भर भर थालियां,
खिलाती आग्रह से अपने कुंवर कन्हैया।

मुस्कुराती और डालती मोहानी
हम हैं प्यारी राधा की सहेली,
घुंघट से नैना मारे होली,
में सुंदर सुंदर हैं साली।

चले आना मोहन बरसाने ताल,
खेलेंगे होली, उड़ाएंगे खूब गुलाल,
राधा के भी होंगे गाल लाल,
लाठी मार कर, करते हैं,
अगवानी ग्वाल बाल संग
आते हैं मनमोहन नंदलाल।

देखो कितना विशाल है हाल
ब्रजभाव में लाला के
अद्भुत हंसी ठिठोले
लाठी मारे गोपी हंसे ग्वाले,
साथ बंशीधर नटखट गोपाल।

 

Leave A Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Related Posts