Home धर्म भारत देश में अनेक भव्य आत्माओं ने जन्म लिया है

भारत देश में अनेक भव्य आत्माओं ने जन्म लिया है

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महाराष्ट्र (विश्व परिवार)। भारत के महाराष्ट्र राज्य के औरंगाबाद जिला जोकि अजंता एलोरा की गुफाओं के कारण प्रसिद्ध हैकिंतु जैन धर्म की धार्मिक दृष्टि से देखेंगे तो अनेक दिगंबर साधु महाराष्ट्र से हुए हैं आचार्य श्री वीर सागर जी आचार्य कल्प चंद्र सागर जी आदि अनेक आचार्य और साधु महाराष्ट्र से हुए हैं। दगड़ा बाई नेमीचंद जी रावका खंडेलवाल के यहां विक्रम संवत 1958 ग्राम अड़गांव में आपका जन्म हुआ आपका नाम हीरा लाल रखा गया सच है यथा नाम तथा गुण आपका लालन-पालन साधारण परिवार में हुआ किंतु आप असाधारण रहे माता ने 2 पुत्र व दो पुत्रियों को जन्म दिया।

प्लेग की बीमारी में आपके माता पिता का निधन हो गया जब श्री हीरालाल जी की उम्र 13 वर्ष की थी तब आपके बड़े विवाहित भाई का भी निधन हो गया निकटवर्ती ग्राम इर गांव में नाम राशि श्री हीरालाल जी गंगवाल आपके शिक्षा गुरु रहे अतिशय क्षेत्र कचनेर स्थित श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन प्राथमिक विद्यालय में आपकी लौकिक शिक्षा हुई आपने प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी के 28 वर्ष की उम्र में दर्शन किए और आचार्य श्री शांतिसागर जी से दो प्रतिमा के नियम व्रत धारण किए विक्रम संवत 1999 में शिक्षा गुरु मुनि श्री वीर सागर जी महाराज से मुक्तागिरी में सात प्रतिमा के नियम लिए तथा ब्रह्मचारी बनकर संघ में प्रवेश किया ।विक्रम संवत 2000 में मध्यप्रदेश के सिद्ध क्षेत्र श्री सिद्धवरकूट में बाल ब्रहमचारी श्री हीरा लाल जी ने मुनि श्री वीर सागर जी महाराज से क्षुल्लक दीक्षा ग्रहण की और क्षुल्लक श्री शिव सागर जी नामकरण हुआ ।लौकिक शिक्षा गुरु हम नाम आपके आध्यात्मिक दीक्षा गुरु भी बन गए विक्रम संवत 2006 नागौर में आपकी मुनि दीक्षा हुई और मुनि श्री वीर सागर जी ने प्रथम मुनि शिष्य के रूप में आपको मुनि दीक्षा दी मुनि दीक्षा के बाद आचार्य श्री वीर सागर जी की समाधि तक आपने गुरुदेव का सानिध्य में ही रहे।आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की समाधि के बाद गुरु आदेश से आचार्य श्री वीरसागर जी को प्रथम पट्टाचार्य पद मिला आचार्य श्री वीरसागर जी की समाधि के बाद मुनि श्री शिव सागर जी को विक्रम संवत 2014 कार्तिक शुक्ला 11सन 1957 को आचार्य श्री शांति सागर जी की परम्परा में दृवतीय पट्टा चार्य पद मिला आचार्य श्री शिव सागर जी ने अपने साधु जीवन में 11 मुनि दीक्षा 21 आर्यिका दीक्षा 2 ऐलक दीक्षा 9 क्षुल्लक दीक्षा और 9 क्षुल्लिका दीक्षा कुल 52 दीक्षाये दी। आपके शिष्यों में मुनि श्री ज्ञान सागर जी,,श्री अजीत सागर जी,श्री सुबुद्धि सागर जी श्री श्रेयांस सागर जी, आर्यिका श्री आदिमति,श्री विशुद्ध मति ,श्री जिनमति, आदि प्रमुख है।अनेक पंच कल्याणक और साधुओं की संलेखना कराई ।

26 वर्ष के साधु जीवन में वर्ष 1944 से वर्ष 1968 कुल 25 चातुर्मास किए। फागुन कृष्णा अमावस्या विक्रम संवत 2025 16 फरवरी सन 1969 को श्री महावीरजी अतिशय क्षेत्र पर आप की अनायास समाधि हो गई आचार्य श्री शिवसागर जी से संबंधित कुछ संस्मरण इस प्रकार है । परंपरा के पंचम पट्टाधीशआचार्य श्री वर्धमान सागर जी आपके मुनि संघ में वर्ष 1968 में शामिल हुए तथा दीक्षा हेतु श्रीफल चढ़ाया।गुरु आदेश से सिद्ध क्षेत्र श्री सम्मेद शिखर जी की यात्रा पर गए ।किंतु वापसी के पूर्व आचार्य श्री शिव सागर जी की समाधि हो गई। आचार्य श्री हमेशा कहते थे कि व्यक्ति को घर से खड़े खड़े निकलना चाहिए आड़े होकर नहीं निकलना चाहिए । अर्थात संयम धारण करने की प्रेरणा देते थे ।आचार्य श्री शिव सागर जी के सानिध्य में खानीया जी में तत्व चर्चा पूरे भारत में प्रसिद्ध रही जब मुनि मार्गी और सोनगढ़ मार्गियों के बीच में आप के सानिध्य में में तत्व चर्चा चली यद्यपि इस चर्चा का कोई हल नहीं निकला किंतु इस तत्व चर्चा से काफी कुछ गलतफहमी भी दूर हुई ।आचार्य श्री शिव सागर जी के संध का चतुर्मास कोटा में चल रहा था।

एक आर्यिका माता जी के पैर में कांच का टुकड़ा चुभ गया ,उससे रक्त बह निकला उन्होंने जब आचार्य श्री कोई धटना सुनाई तो आचार्य श्री ने माताजी को एक उपवास का प्रायश्चित दिया जब किसी ने इस बारे में आचार्य श्री से पूछा कि कोई श्रावक का रक्त निकलता है तो कमजोरी दूर करने के लिए उसको उस दिन हलवा मीठा खिलाया जाता है ताकि इन वस्तुओं से उसके शरीर में खून की पूर्ति हो जाए आचार्य श्री का उत्तर था खून कितना निकला वह महत्वपूर्ण नहीं है ,महत्वपूर्ण यह है कि पेर कदम देखकर क्यों नहीं रखा अगर उस समय कुछ सूक्ष्मजीवों कि अगर विरादना होती तो वह कितना गलत होता इस प्रकार आचार्य श्री अनुशासन में बहुत प्रिय थे एक और प्रसंग देखने में आता है कि पूजा के द्रव्यों का विवेचन करते हुए आचार्य श्री शिव सागर जी ने विश्लेषण प्रस्तुत किया कि आचार्यों ने गेहूं को पूजा की सामग्री में सम्मिलित क्यों नहीं करते चावल को ही क्यों शामिल किया चावल के द्वारा आचार्य श्री भक्तों को भेद विज्ञान काआभास कराते हैं जिस प्रकार धान का छिलका और चावल अलग अलग है उसी प्रकार शरीर और आत्मा अलग-अलग है जिस प्रकार धान का छिलका दूर किए बिना चावल के ऊपर का मेल दूर नहीं किया जा सकता है उसी प्रकार ब्राह्य परिग्रह का त्याग किए बिना अंतरंग परिग्रह नहीं छोड़ा जा सकता है जीवन के काफी प्रसंग हैं जो शिक्षाप्रद है आचार्य श्री शिवसागर जी महाराज की जय।

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