कृष्णानगर(विश्व परिवार)। 500 शिष्य-प्रशिष्यों का कुशल संचालन करनेवाले युग के सर्वश्रेष्ठ संत, ‘अनेकानेक अचेतन तीर्थों के प्रेरणास्रोत, भारत भूमि की युवा शक्ति को व्यस्नों से मुक्त करने वाले, महावीर – राम आदि महापुरुषों के चरणों से स्पर्शित भूमि पर शाकाहार का शंखनाद करनेवाले, सैंकड़ों की संख्या में मानव जीवन के मार्गदर्शक शास्त्रों ग्रंथों की रचना करनेवाले, संस्कृत भाषा में अनेकानेक प्राचीन ग्रन्थों के टीकाकार, “जल बिन्दु महाकाव्य” के रचियता, श्रुत संवर्धक, युगप्रमुख शुद्धोपयोगी संत, बुन्देलखण्ड के प्रथमाचार्य, सूरिगच्छाचार्य गणाचार्य श्री 108 विराग सागर जी महामुनिराज का मनाया गया 42 वाँ मुनि दीक्षा महोत्सव ।
राजधानी दिल्ली कृष्णानगर में विराजमान जिनागय पंथ प्रवर्तक भावलिंगी संत श्रमणाचार्य गुरुवर श्री 108 विमर्शसागर जी महामुनिराज ससंघ (38 पीछी) सानिध्य मैं गणाचार्य श्री विरागसागर जी महामुनिराज की महामह पूजा-आराधना एवं विनयांजति सभा के माध्यम से विशालधर्म सभा के मध्य सम्पन्न हुआ ।
परमपूज्य आचार्य श्री विमर्शसागर जी मुनिराज ने अपने दीक्षा- शिक्षा गुरु वर के दीक्षा दिवस पर अपनी श्रद्धा-भक्ति-समर्पण पुष्य गुरु चरणों में समर्पित
करते हुए कहा आज का दिन गुरु चरणों को छूने का दिन है। आज के दिन इस युग के महानयोगी ने इस पंचम काल की आश्चर्यकारक मुनि दीक्षा ग्रहण की थी। जब किसी का जन्म होता है तब यह कोई नहीं जानता कि यह कोई महापुरुष बनेगा। पूज्य आचार्यश्री ने अपनी अल्प आयु में ही संयम दीक्षा धारण कर ली थी। 09 दिसम्बर 1983 का वह पावन दिन था जब मात्र २० वर्ष की अल्पवय में ही औरंगाबाद की धरती पर परम पूज्य वात्सल्य रत्नाकर आचार्य श्री विमलसागर जी महामुनिराज से क्षुल्लक पूर्णसागर जी ने मुनिदीक्षा धारण की थी और नाम पाया था “मुनिश्री विरागसागर जी मुनिराज “। 9 वर्ष का अल्प मुनिदीक्षा का काल व्यतीत हुआ और गुरुदेव को 08 नवम्बर 1992 द्रोणगिरि सिद्धक्षेत्र पर ‘आचार्य पद दे दिया गया। आचार्य गुरुवर ने स्वयं दीक्षा लेकर अनेकानेक भव्यात्माओं को संसार-दुःखों से मुक्ति का मार्ग दिखाकर अपने साधना का श्रेष्ठ फल उत्तम ही नहीं सर्वोत्तम समाधि के रूप में प्राप्त किया है। गुरुवर की सर्वश्रेष्ठ समाधि ने यह बता दिया कि उनके साधना काल की विशुद्धि भी सवोत्कृष्ट ही रही है। आज वे जहाँ भी हैं श्रेष्ठ स्थान पर ही हैं। गुकवर के 42 वें मुनिदीक्षा दिवस पर इन्हीं शुभ भाव सहित तय भक्ति युतः कोटिशः नमोस्तु है कि जैसे गुरुवर हमें आशीष देते रहते थे वैसे ही सदैव हमें अपना मंगल शुभाशीष प्रदान करते रहें एवं हम सब भी गुरुवर की तरह साधना के सर्वोत्तम फलों को प्राप्त करें।