कुण्डलपुर (विश्व परिवार)। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी मुनि श्री पुण्य सागर एवं 52 साधुओं सहित धरियावद विराजित हैं आपके संघ सानिध्य में प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी परंपरा के द्वितीय पट्टाधीश आचार्य श्री शिव सागर जी का 57 वा अंतरविलय समाधि वर्ष फागुन कृष्णा अमावस्या विशेष पूजन ओर गुणानुवाद के साथ मनाया गया इस अवसर पर आयोजित धर्म सभा में आचार्य श्री वर्धमान सागर ने बताया कि आचार्य शिवसागर जी श्रीफल के समान बाहर से कठोर किंतु भीतर से काफी नरम वात्सल्य पूर्ण उनका व्यवहार रहता था। गुरु के ज्ञान, सानिध्य में विनय पूर्वक अर्जित ज्ञान से शिष्य का जीवन निर्माण होता हैं, गुरु हमेशा शिष्य का हित देखते है आपने आचार्य श्री वीर सागर जी एवं आचार्य श्री अजित सागर जी गृहस्थ अवस्था के ब्रह्मचारी राजमल जी का प्रसंग बताया कि राजमल जी अध्ययन के लिए अन्य स्थान जाने की अनुमति लेने गए ,तो गुरु श्री वीर सागर जी ने सांकेतिक इतना कहा कि पक्षी के पंख आ गए उड़ना चाहता है । संकेत समझ कर राजमल जी संघ में रहे ।सच्चा शिष्य गुरु के संकेत ,संतुलित कम शब्दों को समझ कर विनय भाव से अपने जीवन में उत्थान , उन्नति करता हैं ।आप काफी अनुशासन प्रिय रहे हैं। सन 1968 में हमें आचार्य श्री शिव सागर जी का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ सन 68 में हम संघ में शामिल हुए उस समय एक दिन हमारे पेट दर्द काफी होने की वजह से पूरा संघ चिंतित हो गया और स्वयं आचार्य श्री ने भी अपने समक्ष हमारी चिकित्सा कराई उनका वात्सल्य कभी भूल नहीं सकते हैं हमने मुनि दीक्षा हेतु श्रीफल चढ़ाया तब आचार्य श्री शिव सागर जी ने हमें कहा ब्रह्मचारी जी आपने सम्मेदशिखर जी की यात्रा की या नहीं ? तब हमारी उम्र उस वक्त 19 वर्ष की थी हमने कहा नहीं की तब उन्होंने कहा कि पहले शिखर जी की यात्रा करो दीक्षा के बाद शिखर जी जाना होता है अथवा नहीं गुरु आदेश को स्वीकार कर हम शिखर जी की यात्रा पर निकल गए शिखर जी की पूरी वंदना कर हम जब वापस लौट रहे थे तब मथुरा स्टेशन पर हमें यह सूचना मिली कि आचार्य श्री की अनायास समाधि हो गई। गज्जू भैया, वीणा दीदी ,राजेश अनुसार आचार्य श्री ने उपदेश में आगे बताया कि आचार्य श्री शिव सागर जी का जन्म सन 1902 में हुआ। गृहस्थ अवस्था के नाम अनुरूप आप हीरा थे। हीरालाल जी ने सन 1930 में आचार्य श्री शांति सागर जी के दर्शन कर नियम लिए।आचार्य श्री वीर सागर जी से सन1944 में क्षुल्लक दीक्षा ओर वर्ष 1950 में मुनि दीक्षा लेकर उनकी समाधि तक संघ में रहे।सन 1957 में आप आचार्य बने आपकी सन 1969 में अनायास समाधि हुई। आपने अनेक प्रसंग भाव विभोर होकर बताया कि आप हमेशा व्यक्ति को खड़े खड़े धर से निकलने का उपदेश देते थे क्योंकि आड़े होकर अर्थी निकलती हैं।आपके पूर्व मुनि श्री पुण्य सागर जी ने आचार्य श्री शिव सागर जी के अनेक संस्मरणों में गुरु के अनुशासन ,वात्सल्य, तप उपवास का वर्णन कर गुणानुवाद किया। धर्म सभा में प्रवचन के पूर्व आचार्य श्री शिव सागर जी की भक्ति भाव पूर्वक पूजन की गई। आचार्य संघ सानिध्य में दिनभर धार्मिक अनुष्ठान चल रहे है