धर्म

496 दिन उपवास, 557 दिन मौन साधना करने वाले तपस्वी संत ससंघ पहुंचेंगे

  • कल होगा आचार्य प्रसन्न सागर का मंगल प्रवेश

जहाजपुर  (विश्व परिवार) स्वस्तिधाम जहाजपुर में 20 फरवरी को प्रातः बेला में जैन समाज के तपस्वी संत आचार्य प्रसन्नसागर महाराज ससंघ का मंगल प्रवेश होगा।

इस अवसर को लेकर क्षेत्र में धार्मिक उत्साह का माहौल है और स्वस्तिधाम क्षेत्र समिति तैयारियों में जुटी हुई है। आचार्य प्रसन्न सागर महाराज ने 21 जुलाई 2021 से 28 जनवरी 2023 के मध्य 496 दिन का कठोर उपवास किया तथा मात्र 61 दिन आहार ग्रहण किया। इसी अवधि में उन्होंने 557 दिनों तक मौन साधना कर आध्यात्मिक तपस्या का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया। यह तप साधना उन्होंने झारखंड स्थित पवित्र तीर्थ पारसनाथ पर्वत (सम्मेद शिखर) पर संपन्न की। आचार्य ने 6 मई 2023 को जैनाचार्य परंपरा के महान संत आचार्य विद्यासागर महाराज के चरण पखारकर आजीवन शक्कर एवं चटाई का त्याग करने का संकल्प लिया था। त्याग, तप और साधना के लिए विख्यात आचार्य प्रसन्न सागर अब तक 4000 से अधिक उपवास कर चुके हैं तथा 1 लाख किलोमीटर से अधिक की पदयात्रा कर धर्मप्रभावना की है। उनके आचार्य प्रसन्न सागर महाराज।
संघ में वर्तमान में 9 मुनि महाराज एवं 7 आर्यिका माताजी विहाररत हैं। 20 फरवरी को प्रातःकाल स्वस्तिधाम में स्वागत, शोभायात्रा एवं धर्मसभा का आयोजन प्रस्तावित है। क्षेत्र समिति द्वारा साफ-सफाई, स्वागत द्वार, सजावट और श्रद्धालुओं की व्यवस्थाओं को अंतिम रूप दिया जा रहा है। उसी श्रुंखला में आज उपस्थित गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने कहा कि ये ज़रूरी नहीं कि सब लोग हमें देखे, सुने और समझ भी ले..
क्योंकि तराजू सिर्फ वजन बता सकती है, क्वालिटी नहीं..!
सच तो यही है कि अभी हमको ना देखना आया, ना सुनना आया, और ना समझना आया — अभी हम देखने को देखते हैं, क्योंकि सब देख रहे हैं इसलिए हम भी देख रहे हैं। सुनने को हम सुन रहे हैं, पर जो हम कह रहे हैं, वो कोई भी नहीं सुन रहा है। समझने को हम समझ रहे हैं, पर सच यही है कि हम कुछ भी नहीं समझ रहे हैं, सिवाय अपने स्वार्थ के।वर्षों वर्षों से विद्वान, पंण्डित, सन्त, आचार्य और साधुओं को सुनने के बाद भी हमारे जीवन में कोई परिवर्तन नहीं, ना व्यवहार में – ना आचार में। हमने कहा ना – अभी हम सन्तों को नहीं, अपने आपको, अपनी परम्परा को, अपनी मान्यता को ही सुनते हैं। हम वही सुनते हैं जिससे हमारी धारणा मजबूत होती है। जो हमें बदलता है उसे हम सुनते ही नहीं है। ध्यान रखना! सब साधु सन्त, पण्डित, विद्वान, पादरी अपनी परम्परा, मान्यता, पन्थ और सम्प्रदाय की गन्दगी को ही परोस रहे हैं। इसलिए जीवन में परिवर्तन नहीं आ रहा है। अभी हम धर्म के मर्म से बहुत दूर है। धर्म का मर्म है — अहिंसा, संयम, दया, मैत्री, सदभाव, भाई चारा और परोपकार। अभी हम एक दूसरे को पीछे करने में लगे हैं। प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ में दौड़ रहे हैं। प्रतिस्पर्धा की दौड़ का कोई अन्त नहीं है।जहाँ से प्रतिस्पर्धा की शुरुआत होती है वहीं से प्रेम, मैत्री, सदभाव और अपनापन समाप्त हो जाता है…!!! ‌

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