धर्म

इंद्रिय विषयों में सुख नहीं, आत्मकल्याण ही सच्चा मार्ग – मुनि श्री संभवसागर महाराज

विदिशा (विश्व परिवार)। श्री शांतिनाथ जिनालय, स्टेशन जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा में मुनि श्री संभवसागर महाराज ने कहा कि “इंद्रिय विषयों में कभी सुख नहीं मिलता, आत्म कल्याण का मार्ग ही सच्चा मार्ग है।” उन्होंने अपने ओजस्वी प्रवचन में परमात्मा के स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा कि परमात्मा किसी भाषा या शब्दों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे आत्मा की अनुभूति का विषय हैं,मुनिश्री ने कहा कि जिस पवित्र वाणी से भगवान का नाम लिया जाता है, वह साधना और ज्ञान से प्रस्फुटित होती है। ऐसी वाणी असंख्य जीवों के कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर मोक्षमार्ग को प्रकाशित करती है तथा समाज में धर्म और उत्तम संस्कारों का निर्माण करती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल सुनना पर्याप्त नहीं है, बल्कि धर्म को जीवन में उतारना आवश्यक है, तभी आत्मकल्याण संभव है।
इंद्रिय विषयों की निरर्थकता को स्पष्ट करते हुए मुनिश्री ने उदाहरण दिया कि जैसे केले के वृक्ष में परत दर परत निकलती जाती है,किंतु कोई सारभूत तत्व प्राप्त नहीं होता, उसी प्रकार विषय-भोगों में कभी वास्तविक सुख नहीं मिलता,व्यक्ति सुख की खोज में इधर-उधर भटकता रहता है और जीवन यूँ ही बीत जाता है। उन्होंने वर्तमान समय में युवाओं की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज की अंधी दौड़ का कोई अंत नहीं, युवा वर्ग प्रतिस्पर्धा और भौतिक आकांक्षाओं के दबाव में अवसाद (डिप्रेशन) का शिकार हो रहे है, और कई दुखद घटनाएँ सामने आ रही हैं। उन्होंने कहा कि “जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान हैं”, किंतु रोजगार के लिए विदेश जाने वाले युवाओं के सामने आज अस्थिरता और छंटनी की चुनौती सामने खड़ी है। तकनीकी युग में ए.आई. और आधुनिक प्रणालियों के कारण रोजगार की प्रकृति तेजी से बदल रही है।भारतीय अर्थव्यवस्था पर विचार रखते हुए मुनिश्री ने कहा कि पहले लोगों की आवश्यकताएँ सीमित थीं और वे कम संसाधनों में भी संतोषपूर्वक जीवन जीते थे। गाँवों में एक ही घर में टेलीविजन होता था,जिसे पूरा गाँव मिलकर देखता था। मोटरसाइकिल भी समृद्धि का प्रतीक मानी जाती थी। आज प्रत्येक घर में चारपहिया वाहन हैं और हर हाथ में मोबाइल फोन है। उन्होंने कहा कि वर्तमान व्यवस्था ऋण (लोन) आधारित होती जा रही है, जहाँ व्यक्ति साधनों की चाह में कर्ज के बोझ तले दबता जा रहा है, उन्होंने स्वास्थ्य पर विशेष बल देते हुए कहा कि पहले संसाधन कम थे,परंतु श्रम अधिक था, इसलिए लोग स्वस्थ रहते थे। आज संसाधनों की अधिकता ने चलना-फिरना कम कर दिया है। उन्होंने सभी को प्रतिदिन प्रातः कम से कम दो किलोमीटर पैदल चलने की प्रेरणा दी।मुनिश्री ने कहा कि यदि प्रातः स्टेशन मंदिर से शीतलधाम तक पैदल जाया जाए तो स्वास्थ्य लाभ के साथ-साथ आध्यात्मिक पुण्य का भी संचय होगा। वहाँ विराजमान बर्रो वाले भगवान आदिनाथ की चरण-रज मस्तक पर लगाने से आत्मिक शांति प्राप्त होगी, उन्होंने कहा कि शीतलधाम वह पावन स्थल है जहाँ आचार्य गुरुदेव का चातुर्मास हुआ था, अतः वहाँ का कण-कण पवित्र और ऊर्जा से परिपूर्ण है, जो मनुष्य को शारीरिक और मानसिक व्याधियों से मुक्त करने में सहायक बनता है। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और सभी ने मुनिश्री के प्रेरणादायी प्रवचन से आत्मचिंतन का संकल्प लिया प्रतिदिन प्रातः9 बजे से मुनिसंध के प्रवचन एवं प्रश्नमंच कार्यक्रम संपन्न हो रहा है।

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