किससे अब मैं क्या कहूं, फिर से हम छले गए।
बाट जोहते रहे हम, तुम तो यूं चले गए।।
कहां गई वो गर्जना मिथ्यात्व पर प्रहार था.
सत्य का ही पक्ष था, सत्य का प्रचार था।
तुम तो मर के जी गए, हम तो जी के मर रहे।।
थी अजब कशिश तुम्हारे, हाव-भाव शब्द में।
शब्द सारे मौन हैं, वे स्वयं नि:शब्द हैं।
वाचाल भी तो मौन है, मौन भी मुखर हुए।
सौम्य था वदन तुम्हारा, यूं भुला पाता नहीं।
जैसे तुम चले गए यूं कोई जाता नहीं।
आत्म तत्व ही सहाय, तुम सिखा अमर भये.
मौत देख डर गई, क्या अजब ये जीव है।
मृत्यु देख कह उठी, यह तो संजीव है.
जीना भी सिखा गए, मरना भी बता गए.
काल की ये क्रूरता प्रत्येक पल जगा रही।
संयोग की असारता सामने दिखा रही.
कौन कहता मर गए मरके वे अमर भये.
अट्टहास मृत्यु का देखकर डरे नहीं
मोह राग द्वेष कीच में भी तुम पड़े नहीं.
काल भी नमन करे स्वयं में वे चले गए.
मैं हूं सिद्ध वंश का भूल मैं भटक रहा।
देह – भोग और संयोग मोह में अटक रहा।
तुम तो सीख कर गए, हमें भी सिखा गए.
जिनको संग समझ रहे थे, वे स्वयं असंग थे.
संयोग सारे नि:सहाय, सामने प्रसंग है ये.
अपने में ही यूं रमे, यूं कभी रमे नहीं।





