छत्तीसगढ़धमतरी

28 बच्चों से 125 तक पहुंची सरकारी स्कूल की ताकत, शिक्षक लीलाराम साहू को मिलेगा राज्यपाल सम्मान

धमतरी (विश्व परिवार)। कहते हैं कि बदलाव के लिए बड़े संसाधनों से ज्यादा जरूरी होती है एक मजबूत सोच और उसे जमीन पर उतारने का जुनून। धमतरी के धौराभाठा गांव में पदस्थ शिक्षक लीलाराम साहू ने इसी सोच को अपनी कार्यशैली का हिस्सा बनाया और एक सरकारी स्कूल की तस्वीर बदलकर रख दी।
कभी जिस स्कूल में विद्यार्थियों की संख्या महज 28 थी, आज उसी शाला में 125 बच्चे पढ़ रहे हैं। खास बात यह है कि यहां बच्चों का रुझान लगातार बढ़ रहा है और अभिभावकों का भरोसा भी सरकारी स्कूल की ओर मजबूत हुआ है।
‘मेरा स्कूल ही मेरी पहचान है’ बना सक्सेस फार्मूला
शासकीय प्राथमिक शाला धौराभाठा के प्रधानपाठक लीलाराम साहू का मानना है कि बच्चों के लिए पढ़ाई बोझ नहीं, बल्कि सीखने और आनंद लेने का माध्यम होनी चाहिए। इसी सोच के साथ उन्होंने पारंपरिक पढ़ाई के साथ कई नवाचारों को अपनाया।
खेल-खेल में पढ़ाई, सरल तरीके से कठिन विषयों को समझाना और तकनीक का इस्तेमाल—इन प्रयासों ने बच्चों में पढ़ाई के प्रति दिलचस्पी बढ़ाई। स्कूल में स्मार्ट क्लासरूम की स्थापना भी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम रहा।
28 से 125 तक पहुंची स्कूल की दर्ज संख्या
लीलाराम साहू के प्रयासों का असर स्कूल की दर्ज संख्या में साफ दिखाई देता है। जिस शाला में कभी सिर्फ 28 विद्यार्थी थे, वहां अब 125 बच्चे शिक्षा हासिल कर रहे हैं।
लीलाराम साहू ने अपने शिक्षक जीवन में तीन अलग-अलग स्कूलों में सेवाएं दी हैं। उन्होंने मुड़पार, तरसीवां और धौराभाठा में काम करते हुए स्कूलों को स्मार्ट शाला के रूप में विकसित करने की दिशा में काम किया। मुड़पार में भी उनके कार्यकाल के दौरान विद्यार्थियों की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई।
उनका मानना है कि स्कूल का विकास किसी एक व्यक्ति के प्रयास से संभव नहीं होता। इसके लिए शिक्षकों, पालकों, समुदाय और शासन-प्रशासन सभी का सहयोग जरूरी है।
शिक्षक दिवस पर मिलेगा राज्यपाल सम्मान
शिक्षा के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान को देखते हुए शिक्षक दिवस के अवसर पर लीलाराम साहू को सम्मानित किया जाएगा। राज्यपाल रमेन डेका उन्हें प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित करेंगे। राज्यपाल सम्मान की खबर सामने आने के बाद धौराभाठा गांव में भी खुशी का माहौल है। ग्रामीणों, पालकों और स्कूल के विद्यार्थियों के लिए यह गर्व का क्षण है।
लीलाराम साहू की कहानी यह बताती है कि सरकारी स्कूलों की तस्वीर बदलने के लिए सिर्फ बड़ी इमारतें या महंगे संसाधन ही जरूरी नहीं। अगर शिक्षक के भीतर बच्चों के भविष्य को बेहतर बनाने का जुनून हो, तो सीमित संसाधनों में भी एक स्कूल को ‘विद्या का मंदिर’ बनाया जा सकता है।

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