नई दिल्ली (विश्व परिवार)। जैन धर्म में पर्युषण और दशलक्षण महापर्व आत्मचिंतन, संयम, तप, स्वाध्याय और आत्मशुद्धि के अत्यंत पवित्र अवसर हैं। वर्ष 2026 में श्वेतांबर परंपरा का पर्युषण पर्व 8 सितंबर से 15 सितंबर तक तथा दिगंबर परंपरा का दशलक्षण महापर्व 16 सितंबर से 25 सितंबर तक मनाया जाएगा। दोनों परंपराओं की विधियाँ भिन्न हैं, किंतु उनकी आध्यात्मिक दिशा एक ही है: कषायों से निवृत्त होकर आत्मा के निर्मल स्वरूप की ओर अग्रसर होना।
श्वेतांबर परंपरा में पर्युषण आठ दिनों की आध्यात्मिक साधना है। इन दिनों सामायिक, प्रतिक्रमण, स्वाध्याय, तप और आत्मावलोकन का विशेष महत्व है। 15 सितंबर को संवत्सरी इसका विशेष आध्यात्मिक अवसर है। यह दिन अपने ज्ञात-अज्ञात अपराधों के लिए क्षमा मांगने, दूसरों को क्षमा करने तथा सभी जीवों के प्रति मैत्री और करुणा का भाव विकसित करने की प्रेरणा देता है।
दिगंबर परंपरा में दशलक्षण महापर्व दस दिनों की आत्मसाधना है। इसमें क्रमशः उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य और उत्तम ब्रह्मचर्य धर्मों की आराधना की जाती है। प्रत्येक धर्म आत्मा में निहित श्रेष्ठ गुणों को जागृत करने और उन्हें जीवन में धारण करने की प्रेरणा देता है।
दिगंबर जैन कालदर्शन की परंपरागत मान्यता के अनुसार काल अनादि और अनंत है तथा उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी के कालचक्र निरंतर प्रवाहित होते हैं। इसी पारंपरिक कालगणना में भाद्रपद शुक्ल पंचमी का दशलक्षण महापर्व के आरंभ से विशेष संबंध माना गया है।
इन दोनों पर्वों का वास्तविक उद्देश्य केवल व्रत, उपवास और धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अंतःकरण और आचरण का परिष्कार है। क्रोध क्षमा में, अहंकार मार्दव में, कपट आर्जव में, लोभ शौच में और आसक्ति आकिंचन्य में परिवर्तित होने लगे, तभी साधना वास्तव में सार्थक होती है।
पर्युषण हमें अपने दोषों को पहचानकर क्षमा मांगना और दूसरों को हृदय से क्षमा करना सिखाता है; दशलक्षण हमें आत्मा के उत्तम गुणों को जागृत कर उन्हें जीवन में धारण करने की प्रेरणा देता है। दोनों का शाश्वत संदेश यही है: दूसरों पर विजय से बड़ी विजय स्वयं पर विजय है; और अपने भीतर के विकारों पर विजय ही सच्ची आत्मविजय है।







