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आत्मशुद्धि का पर्व—पर्यूषण: डॉ. भागचन्द्र जैन

रायपुर (विश्व परिवार)। पर्व का संबंध धर्म से होता है और धर्म के लिए मानव ही पुण्यरूपी वृक्ष है। पर्व से नई प्रेरणा, नई जागृति, नई ऊर्जा और नई दिशा मिलती है। पर्व की महत्ता तीर्थ से कम नहीं है। पर्व के माध्यम से आत्मपरीक्षण और आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है। आत्मा की शुद्धि का साधन धर्म है—आत्मशुद्धि साधन धर्म।

जैन धर्म में पर्यूषण पर्व को पर्वराज पर्यूषण कहा जाता है। भादों के महीने में दिगंबर और श्वेतांबर दोनों संप्रदायों में पर्यूषण पर्व मनाया जाता है। इस दौरान उत्तम क्षमा, सत्य, मार्दव, आर्जव, शौच, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य की साधना के माध्यम से आत्मशुद्धि का प्रयास किया जाता है। वर्ष में तीन बार पर्यूषण पर्व आते हैं, किंतु भाद्र शुक्ल पंचमी से अनंत चतुर्दशी तक मनाए जाने वाले पर्व की महत्ता अधिक मानी गई है।

उत्तम क्षमा: क्षमा को वीरों का आभूषण कहा गया है—‘क्षमा वीरस्य भूषणम्’। क्षमा सहज सुख की जननी मानी जाती है। इसलिए जाने-अनजाने में हुई भूलों के लिए क्षमाप्रार्थी अवश्य बनना चाहिए।

उत्तम मार्दव: मृदुल व्यवहार से व्यक्ति अपनी अमिट छाप छोड़ता है। मधुर वाणी और विनम्र व्यवहार से मनुष्य स्वयं भी सुखी रहता है और दूसरों को भी सुख पहुंचाता है। इसलिए अभिमान से दूर रहकर मधुर व्यवहार करना चाहिए।

उत्तम आर्जव: न्याय और नीति के मार्ग पर चलकर कीर्ति और यश फैलाने में भागीदार बनना चाहिए। जीवन में सरलता के साथ परोपकार की भावना को अपनाना चाहिए।

उत्तम सत्य: ‘सांच से बड़ा कोई धर्म नहीं और झूठ से बड़ा पाप नहीं।’ इसलिए मन, वचन और कर्म से सत्य का पालन करना चाहिए।

उत्तम शौच: परिणामों की पवित्रता को उत्तम शौच कहा जाता है। लोभ से दूर रहते हुए मन की भावनाओं को निर्मल और पवित्र बनाना चाहिए।

उत्तम संयम: मन, वचन और कर्म से किसी जीव को संताप न पहुंचाना ही सच्ची अहिंसा है। अहिंसा का यह उत्कर्ष जैन परंपरा की विशिष्ट देन है। हिंसा का त्याग कर प्राणी मात्र के प्रति दया रखनी चाहिए। स्वयं पर शासन करते हुए संयम का पालन करना चाहिए।

उत्तम तप: भावना और साधना से भगवान की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। तप के लिए समस्त परिग्रहों का त्याग कर ध्यानमग्न होकर साधना की जाती है।

उत्तम त्याग: त्याग को मानव जीवन की शोभा कहा गया है। राग-द्वेष का त्याग कर दीन-दुखियों के प्रति दया और सेवा की भावना रखनी चाहिए।

उत्तम आकिंचन्य: आकिंचन्य के माध्यम से आत्मपरीक्षण पर जोर दिया जाता है। ज्ञान और दर्शन के माध्यम से व्यक्ति अपने भीतर की आसक्ति और मोह को पहचानकर उससे दूर होने का प्रयास करता है।

उत्तम ब्रह्मचर्य: ब्रह्मचर्य को मानव जीवन का श्रृंगार कहा गया है। यह आत्मसंयम, पवित्रता और सदाचार का मार्ग प्रशस्त करता है।

पर्यूषण पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान का अवसर नहीं, बल्कि आत्मपरीक्षण, आत्मसंयम और आत्मशुद्धि की प्रेरणा देने वाला पर्व है। यह पर्व मनुष्य को अपने भीतर झांकने, गलतियों का परिमार्जन करने और जीवन को धर्म, सत्य, अहिंसा, संयम एवं सदाचार के मार्ग पर आगे बढ़ाने का संदेश देता है।

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