(विश्व परिवार)। समाधिस्थ 86 वर्षीय आर्यिका श्री जिनेश मति समाधि महोत्सव में पंच तत्व में लीन आचार्य श्री वर्धमान सागर जी जी की शिष्या 86 वर्षीय आर्यिका श्री जिनेश मति की विमान डोल यात्रा आचार्य संघ के साधुओ के सानिध्य में आचार्य श्री धर्म सागर समाधि स्थल पर विधि विधान पूर्वक धार्मिक क्रिया अग्नि संस्कार कर पंच तत्व में लीन किया गया। 10 से अधिक जिनालयों ,अनेक साधुओं की जन्म,दीक्षा,समाधि भूमि धर्म नगरी सीकर में सन 1987 में आचार्य श्री धर्म सागर जी की समाधि के 39 वर्षों के बाद परंपरा के दिगंबर साधु की समाधि हुई। आर्यिका श्री महाशय मति ने बताया कि मृत्यु को अपनी आँखों से देखना समाधिमरण ह व्यक्ति अपने संयमी जीवन को (जन्म) अपनी आँखों से देखता है उसका मरण समाधिमरण कहलाता है। इसमें यही बात छिपी हुई है कि व्रत-संयम व तप के साथ मरना समाधिमरण कहलाता । डॉ .राजेश पंचोलिया अनुसार आर्यिका श्री ने आगे बताया कि सरल भाषा में अगर समाधिमरण को समझना चाहे तो सभी शत्रु-मित्र स्वजन परजन से क्षमा माँगकर व क्षमा कर आहार पानी की इच्छा से रहित होकर, पंचपरमेष्ठी का श्रवण करते हुए गुरु चरण में अपने प्राणों का विसर्जन करना समाधिमरण है। होश में मरना समाधिमरण है और बेहोशी में मरना मौत है जो कि प्रायः सबकी होती है जो मरण महोत्सव का रूप धारण कर लें। जिस मरण में गुरुजन भी जिसकी अर्थी के साथ-साथ चले उस मरण को समाधिमरण कहते हैं। एक असंयमी भोगी-रागी-द्वेषी की अर्थी निकलती है। पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिघि आचार्य श्री वर्धमान सागर से दीक्षित शिष्या 86 वर्षीयआर्यिका श्री जिनेश मति जी की समाधि 6 नवंबर को होने से माताजी का डोला विमान यात्रा 7 नवंबर को वात्सल्य वारिघि पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के संघ सानिध्य में निकाली गई। आर्यिका श्री के डोले के आगे कमंडल लेकर भूमि शुद्धि कंधा लगाने का सौभाग्य गणपत,किशोर,विनोद काला गौहाटी , कलकत्ता, हैदराबाद परिवार को प्राप्त हुआ केवल जैन समाज में साधु की समाधि होने पर महिलाएं समाधि महोत्सव में शामिल होकर भूमि शुद्धि,कंधा देना,पंचामृत अभिषेक कर अग्नि संस्कार में शामिल होती हैं डोल यात्रा में स्थान स्थान पर पुष्प वृष्टि की गई ।समाधिस्थल परिसर में मंत्रोचार से शुद्धि की गई। पंडित आशीष एवं लोकेश गजराज के सहयोग से आर्यिका श्री की पूजन शांतिधारा और पंचामृत अभिषेक गृहस्थ अवस्था के श्रीमती मुन्नी गणपत, बबीता किशोर,श्वेता महेंद्र,चेलना विनोद काला परिवार एवं श्रीमती किरण संतोष,सुमन निरंजन,संतोष राजेश पुत्र पुत्रियों परिजनों द्वारा उल्टे क्रम से किया गया। उल्लेखनीय है कि सीकर नगर में आचार्य श्री धर्म सागर जी सहित अनेक पुण्यशाली भव्य क्षपक साधुओं की पूर्व में समाधि हुई हैं । आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने 37 वर्ष के आचार्य पद पर स्वयं 80 से अधिक समाधि कराई हैं।








