- संगोष्ठी के विषय ‘हिन्दी पत्रकारिता: अतीत, वर्तमान एवं भविष्य पर वक्ताओं ने साझा किए विचार
अयोध्या (विश्व परिवार)। हिन्दी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष पूरे होने व स्मृति शेष जनमोर्चा के संपादक रहे शीतला सिंह की याद में नगर के सिविल लाइन स्थित प्रेस क्लब में ‘हिन्दी पत्रकारिता : अतीत, वर्तमान एवं भविष्य विषय पर व्याख्यानमाला एवं संगोष्ठी का आयोजन शनिवार को किया गया।
संगोष्ठी में वक्ता के तौर पर प्रेस कौंसिल आफ इण्डिया के पूर्व सदस्य डा. बलदेवराज गुप्ता, साहित्यकार एवं पत्रकार नासिरा शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी सिंह, प्रो. अरुण कुमार त्रिपाठी, अरविन्द कुमार सिंह, प्रदीप जैन व साहित्यकार चन्द्रेश्वर ने अपने विचार साझा किए।
यह आयोजन जनमोर्चा हिन्दी दैनिक, हिन्दी समाचार पत्र सम्मेलन व प्रेस क्लब के संयुक्त तत्वावधान हुआ। इस मौके पर हिन्दी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष पूरे होने पर स्मारिका का विमोचन किया गया।
साहित्यकार एवं पत्रकार नासिरा शर्मा ने अपने उद्बोधन के शुरुआत में जनमोर्चा के संपादक रहे शीतला सिंह से जुड़ी स्मृतियों और पत्रकारिता को लेकर उनके दृष्टिकोण का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि किस तरह से शीतला सिंह ने स्वयं को निष्पक्ष रखते हुए पत्रकारिता के मूल्यों को जीवित रखा।
श्रीमती शर्मा ने अपनी ईरान यात्रा से जुड़े किस्से को बयां करते हुए बताया कि जब वह ईरान के शिक्षा मंत्री का इंटरव्यू लेने गयी तो उनके पहले ही सवाल पर वहां के शिक्षा मंत्री भड़क गये। उन्होंने मेरे सवाल कि ‘जब आप धर्म को मानते हैं तो यह कैसे पढ़ायेंगे कि दुनिया कैसे बनी है। इस पर उन्होंने कहा कि आपके तौर-तरीके ठीक नहीं हैं। आप स्वयं बसहर जायेंगी या हम सुरक्षा गार्डों को बुलायें।
उन्होंने कहा कि पत्रकारिता वक्त की धारा बदल देती है लेकिन अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता। उन्होंने कहा कि शिकायत यह है कि आज के दौर में दिल खोलकर बात नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि बाहर रिपोर्टिंग करने के लिए पत्रकारों के पास धन नहीं है और नुकसान होने पर भरपाई भी नहीं की जाती है। इससे पत्रकारिता का नुकसान हो रहा है।
उन्होंने कहा कि एक साहित्यकार किसी भी घटना को उपान्यास के तौर पर आप तक पहुंचाने में तीन साल लगा सकता है लेकिन पत्रकार उस घटना को बहुत ही कम समय में लोगों तक पहुंचा सकता है। उन्होंने कहा कि हूकूमतों का आना-जाना लगा रहता है लेकिन पत्राकरिता निर्भीक एवं सच्ची होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि आज के एडीटर अपने संवाददाताओं से न तो कुछ लिखवाते हैं और न ही बुलवाते हैं। महिला पत्रकारों को समझा जाता है कि वह कुछ बोल नहीं पायेगी।
पत्रकारिता के समक्ष बढ़ती जा रही चुनौतिया : प्रदीप जैन
छत्तीसगढ़ से आये दैनिक विश्व परिवार के संपादक प्रदीप जैन ने कहा कि पत्रकारिता के समक्ष चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। सोशल मीडिया के एक्टिव होने से हर कोई अपने आप को पत्रकार समझ रहा है। सूचना इधर से उधर जा रही है, सूचनाओं के इधर-उधर जाने से सच्ची पत्रकारिता नहीं होती। उन्होंने बताया कि जब शीतला सिंह झांसी आते थे तो वह जनमोर्चा के लिए पहले संपादकीय लिखते थे और उसे छपने के लिए भेजने के बाद हीे कोई और काम करते थे। उन्होंने बताया कि 1826 में उदन्त मार्तण्ड से शुरु हुआ हिन्दी पत्रकारिता का दौर आज अपने दौ सौ वर्ष पूरे कर रहा है।
लोकतन्त्र में जनता ही मालिक: डा. बलदेवराज गुप्ता
प्रेस कौंसिल ऑफ इण्डिया के पूर्व सदस्य डा. बलदेवराज गुप्ता ने कहा कि भाषा जो चलन में रहे वही सही है। उन्होंने जावेद अख्तर से जुड़ा संस्मरण सुनाते हुए बताया कि एक महफिल में कैसे कोई दीवार की हिन्दी नहीं बता पाया था। उन्होंने कहा कि अतीत हमें हिम्मत देता है कि हम आगे कैसे बढ़ें। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता का भविष्य डिजिटल हो गया है। आज की पत्रकारिता में खबर के स्रोत का वेरीफिकेशन नहीं है। उन्होंने कहा कि पहले भी पत्रकारिता में कंटेन्ट की कमी हुआ करती थी आज भी कंटेन्ट की कमी है। किसी गलत आदमी के हाथ में टेक्नालोजी जाने पर उसके बर्बाद होने का खतरा बहुत ज्यादा होता है। एआई के गलत हाथों में जाने से पत्रकारिता का नुकसान हो रहा है।
उन्होंने कहा कि पहले के दौर में पत्रकारिता में बकैती नहीं थी। आज के दौर में लोग तैयारी करके नहीं जाते और बकैती करते हैं। आज के दौर में लोग ब्रेकिंग न्यूज के चक्कर में परेशान हैं। उन्होंने कहा कि खबर सूंघकर लिखने की क्षमता होनी चाहिए। सूचना सुनना, पढ़ना व देखना शुरु करिए इससे ही हल निकलेगा। धर्म के नाम पर पहले भी झगड़ा होता था आज भी होता है इससे घबराने की आवश्यकता नहीं है। आपका मंच सभी राजनीतिक पार्टियों के लिए खुला रहना चाहिए। जीत जनता की होगी, लोकतन्त्र में जनता ही मालिक है। उन्होंने कहा कि बकैती पत्रकारिता बन्द करके सड़क पर उतरना चाहिए।
उन्होंने कहा कि वर्तमान दौर में दो शब्द चुराये गये हैं जिसमें पहला शब्द फकीर है जो कि विस्टर्न चर्चिल ने महात्मा गांधी के लिए प्रयोग किया था। दूसरा शब्द प्रधान सेवक है जो पं. जवाहर लाल नेहरु के लिए प्रयोग होता था। उन्होंने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री व मनमोहन सिंह की ईमानदारी की कसौटी पर वर्तमान प्रधानमंत्री को परख कर देखिए हालात का पता चल जायेगा।
पत्रकारिता काल के पीछे दौड़ने की प्रक्रिया है : प्रो. अरुण कुमार त्रिपाठी
प्रो. अरुण कुमार त्रिपाठी ने कहा कि आज के दौर में जो सच्ची पत्रकारिता कर रहा है वह बहुत ही हिम्मत का काम है। उन्होंने बताया कि किस तरह से एक संपादक ने कहा कि कन्टेन्ट इज नथिंग केवल आज के दौर की पत्रकारिता की चकाचौंध देखिए। उन्होंने बताया कि जब अखबार कलर होने लगे तो मैंने कंटेन्ट पर उनके विचार जानना चाहा। इस पर मुझे मीटिंग में बुलाया जाना बन्द कर दिया गया। उन्होंने कहा कि आज के दौर में बासी खबरों को अखबार में सजाया जा रहा है। उन्होंने कहाकि पत्रकारिता काल के पीछे-पीछे दौड़ने की एक प्रक्रिया है। उन्होंने कहा कि यह भी शोध होना चाहिए कि मुश्किल दौर में कौन-कौन अखबार सीना तान कर खड़ा रहा और कौन शुतुर्रमुर्गी मुद्रा अपनाये हुए हैं।
प्रो. त्रिपाठी ने कहा कि पत्रकारिता दैवीय विधा नहीं है। तमाम जगह नारद को पहला पत्रकार बताया जाता है यह सही नहीं है। आज के दौर में पूजन की परम्परा बढ़ती जा रही है इसीलिए नारद को पत्रकारिता का आदर्श बताया जाता है। आज के पत्रकारों में नचिकेता जैसा प्रश्न पूछने का साहस होना चाहिए, चाहे वह प्रश्न अपने पिता से पूछना हो या फिर मौत के देवता यमराज से पूछना हो।
उन्होंने कहा कि भविष्य के आसार बन रहे हैं उनमें कोई समाचार पत्र पढ़ने की जहमत नहीं उठायेगा। आदमी की पढ़ने की रूचि कम हो रही है। इसका सबसे बड़ा कारण मोबाइल है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता का काम सूचनाओं की बम वर्षा करना नहीं है। इसका काम मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण होना चाहिए।
संपादक नाम की संस्था कमजोर हो रही है: अरविन्द कुमार सिंह
वरिष्ठ पत्रकार अरविन्द कुमार सिंह ने कहा कि मौजूदा दौर में कन्टेन्ट इसलिए कमजोर है क्योंकि संपादक की संस्था कमजोर हो रही है। संवाददाता किसी भी अखबार का प्रतिनिधि होता है। आज के दौर में हम सूचना व संचार क्रान्ति के दौर में हैं लेकिन यह नहीं जान पाते कि पड़ोस में कौन रह रहा है। तकनीक ने अखबारों की लागत थोड़ी कम की है। उन्होंने कहा कि जनमोर्चा में संपादक की संस्था पहले भी मजबूत थी और आज भी है। उन्होंने कहा कि कारपोरेट चाहता है कि आप पेपरलेस हो जायें क्योंकि अखबार में छपने का मतलब सत्यता है। किसान आन्दोलन के समय पूरी दुनिया ने देखा कि कैसे एक कम पढ़ा लिखा आदमी आंदोलन का नेतृत्व कर रहा है।
उन्होंने कहा कि किसान आन्दोलन ने गांव के लोगों को अखबार पढ़ना सिखा दिया। उन्होंने कहा कि आने वाला समय भाषाई पत्रकारिता का है।
आज का दौर डिजिटल पत्रकारिता का दौर है: शीतल पी सिंह
वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी सिंह ने कहा कि आज का दौर डिजिटल पत्रकारिता का दौर है। हर हाथ में मोबाइल है लोग सूचनाओं तक जल्दी पहुंच जा रहे हैं। पहले के दौर में हम लोग हाथ से खबर लिखकर भेजते थे आज वहीं मोबाइल पर देख ले रहे हैं। उन्होंने कहा कि आज के दौर में अगर हम पत्रकार हैं तो हमें आज के चैलेंज को समझना होगा। हम पुराने दौर में पड़े नहीं रह सकते। उन्होंने कहा कि दुनिया में तकनीक के साथ-साथ मालिकाना भी बदल रहा है। डिजिटल पत्रकारिता को नियन्त्रित करने वाली दोनों कम्पनियां अमेरिका की हैं। आज के दौर में कोई भारतीय नहीं है जो गूगल, मेटा व एक्स जैसा प्लेटफार्म विकसित कर सके। उन्होंने कहा कि एआई प्रयोग करने का लक्ष्य तय होना चाहिए। दुनिया का संचालन पूंजी के हाथ में है। गूगल पर सब पता चल जायेगा कि वैश्विक स्तर पर भारत में किसी की आय में कोई वृद्धि नहीं हुई है। उन्होंने कहा कि आज के दौर में जिस तरह से गर्मी बढ़ी है उसका कारण पेड़ों को बड़ी संख्या में काटा जाना है। तमाम पेड़ उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने के लिए कटवाये जा रहे हैं उनके लिए कोई कानून नहीं है।
पहले अखबार के मालिक संपादकों को नियन्त्रित नहीं करते थे: चन्द्रेश्वर
साहित्यकार चन्द्रेश्वर ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि हिन्दी पत्रकारिता में हिन्दी की लघु पत्रिकाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। पहले के दौर में पत्रिकाओं में छपने वाली रचनाओं व कथाओं को मालिकों द्वारा नियन्त्रित नहीं किया जाता था। उस समय अखबार का मालिक संपादकों को नियन्त्रित करने का काम नहीं करता था। आज के दौर में साहित्यक पत्रिकाओं के पाठक घटे हैं पहले की बड़ी पत्रिकाएं भी लघु पत्रिकाओं की श्रेणी में आ गयी हैं।
उन्होंने कहा कि अखबार व पत्रिकाओं में छपे हुए शब्दों की क्रेडिबिल्टी होती है। आज के दौर में अखबार घरों में आ तो रहे हैं लेकिन डिजिटल दौर में पढ़े नहीं जा रहे हैं।
व्याख्यानमाला एवं संगोष्ठी का संचालन जनमोर्चा की संपादक डा. सुमन गुप्ता ने किया। अतिथियों के प्रति आभार ज्ञापन जनमोर्चा के स्थानीय संपादक रामकुमार सिंह ने किया और कहाकि जनमोर्चा परिवार को चुनौतीपूर्ण समय में आगे बढ़ने की ताकत मिली। प्रेस क्लब अध्यक्ष सुरेन्द्र श्रीवास्तव ने मांग की कि जनमोर्चा के संपादक रहे शीतला सिंह को केन्द्र सरकार पद्म श्री सम्मान से सम्मानित करे। इसके लिए हमारे मंच पर बैठे अतिथिगण भी प्रयास करें।
संगोष्ठी में आये हुए वक्ताओं का स्वागत प्रकाशन सहकारी समिति के अध्यक्ष अतुल कुमार सिंह, जनमोर्चा के स्थानीय संपादक रामकुमार सिंह, सह संपादक सूर्यनारायण सिंह, प्रबन्धक सुरेश यादव, प्रेस क्लब अध्यक्ष सुरेन्द्र श्रीवास्तव, सचिव जयप्रकाश सिंह, वरिष्ठ पत्रकार रमेश त्रिपाठी व सुनील यादव ने पुष्पगुच्छ भेंटकर किया।
इस मौके पर सपा नेता पूर्व विधायक जयशंकर पाण्डेय, वरिष्ठ पत्रकार हरिकृष्ण अरोड़ा, प्रो. रघुवंशमणि, अमृत विचार के स्थानीय संपादक विवेक सक्सेना, पत्रकार अशोक मिश्र, पूर्व विधायक हुबराज, सपा नेता छेदी सिंह, साहित्यकार पूनम सूद, पत्रकार इन्दुभूषण पाण्डेय, त्रियुग नारायण तिवारी, ओमप्रकाश सिंह, सुनीता पाण्डेय, सरोज यादव, कांग्रेस नेता राजेन्द्र प्रताप सिंह, पेट्रोलियम डीलर्स एसोशिएसन के प्रदेश उपाध्यक्ष राजेश सिंह, पूर्व प्राचार्य डा. अभय सिंह, खादी संस्था मंत्री सर्वजीत पाण्डेय, प्रबन्धक यमुना प्रसाद अवस्थी, लेखाधिकारी रामदास पाण्डेय, भाकपा नेता सूर्यकान्त पाण्डेय, मजदूर संघ के जिलाध्यक्ष अम्बरीश सिंह, क्षत्रिय बोर्डिंग हाउस सोसाइटी के मंत्री अनिल सिंह, बोर्डिंग सदस्य अनिल सिंह, रामकेर सिंह, डा. अनिल सिंह, कामरेड अशोक तिवारी, भाजपा नेत्री मधु पाठक, कवि डा. विशाल श्रीवास्तव, विजय शंकर पाण्डेय, आरपी सिंह, अंजनी तिवारी, प्रदीप पाठक, डा. विवेक कुमार सिंह, डा. चक्रवर्ती सिंह, रालोद नेता रामसिंह पटेल, एसएन बागी, सरोज दूबे, दीपकृष्ण वर्मा, स्वप्निल श्रीवास्तव, रूबी सोनी, हरिप्रसाद दूबे, प्रेम कुमार पाण्डेय, मोतीलाल तिवारी, रवीन्द्र कबीर, दीपक वर्मा, आरडी आंनद, सत्यभान सिंह जनवादी, श्याम बाबू गुप्ता, दीपसहाय सहित बड़ी संख्या में गणमान्य व जनमोर्चा परिवार के सदस्य मौजूद रहे।







