- छत्तीसगढ़ के एकमात्र विद्वान पं. नितिन जैन को मिला ‘प्रतिष्ठा प्रशिक्षु’ सम्मान
- दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय प्रतिष्ठा कार्यशाला में रायपुर के विद्वान ने बढ़ाया छत्तीसगढ़ का गौरव
रायपुर (विश्व परिवार)। धार्मिक एवं आध्यात्मिक क्षेत्र में छत्तीसगढ़ के लिए गौरव का विषय है कि रायपुर के विद्वान पं. नितिन जैन को ‘प्रतिष्ठा प्रशिक्षु’ की उपाधि से विभूषित किया गया है । अखिल भारतवर्षीय आगममार्गी विद्वत परिषद के तत्वावधान में पट्टाचार्य भगवन श्री विशुद्धसागर जी महाराज के पावन सानिध्य में नई दिल्ली स्थित श्री दिगम्बर जैन मंदिर, ऋषभ विहार में आयोजित त्रिदिवसीय
आगममार्गी प्रतिष्ठा शिरोमणि कार्यशाला-2 में उन्हें यह उपाधि प्रदान की गई। इस राष्ट्रीय स्तर के आयोजन में पं. नितिन जैन की सहभागिता और उपलब्धि ने छत्तीसगढ़ को विशिष्ट पहचान दिलाई, क्योंकि वे इस महाआयोजन में प्रदेश से भाग लेने वाले एकमात्र विद्वान रहे। कार्यशाला में देशभर से पधारे लगभग 150 विद्वानों ने पंचकल्याणक प्रतिष्ठा से संबंधित विभिन्न विषयों पर गहन अध्ययन, चिंतन एवं विचार-विमर्श किया। विद्वानों ने प्रतिष्ठा संबंधी आलेखों का वाचन कर अपने शोध एवं अध्ययन को प्रस्तुत किया तथा पट्टाचार्य भगवन श्री विशुद्धसागर जी महाराज के सानिध्य में विभिन्न जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त किया।
इस कार्यशाला का प्रथम सत्र अतिशय क्षेत्र कारीटोरन में आयोजित हुआ था, जहां लगभग 150 विद्वानों ने 42 प्रतिष्ठा ग्रंथों का स्वाध्याय कर ‘प्रतिष्ठा शिरोमणि’ ग्रंथ के परिशोधन में योगदान दिया। इसके संकलनकर्ता पं. महेश कुमार शास्त्री, डीमापुर/कारीटोरन हैं। दिल्ली में आयोजित कार्यशाला में इसी अध्ययन प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए पूर्व में किए गए स्वाध्याय को आलेखों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया।कार्यशाला में विद्वानों के उल्लेखनीय प्रदर्शन, अध्ययन एवं पूर्व अनुभव के आधार पर वरिष्ठ विद्वानों को ‘प्रतिष्ठा शिरोमणि’ तथा नव विद्वानों को ‘प्रतिष्ठा प्रशिक्षु’ की उपाधि से सम्मानित किया गया। इसी क्रम में पं. नितिन जैन को प्रतिष्ठा प्रशिक्षु की उपाधि से विभूषित किया जाना उनके धार्मिक अध्ययन एवं प्रतिष्ठा संबंधी ज्ञान की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। देश के विभिन्न राज्यों से आए प्रतिष्ठित विद्वानों की उपस्थिति में पं. नितिन जैन को प्राप्त यह सम्मान रायपुर सहित समूचे छत्तीसगढ़ के जैन समाज के लिए हर्ष एवं गौरव का विषय है। उनकी यह उपलब्धि धार्मिक अध्ययन, आगम परंपरा के संरक्षण तथा प्रतिष्ठा विधानों के ज्ञान को आगे बढ़ाने की दिशा में प्रेरणादायी मानी जा रही है।







