डोंगरगांव (विश्व परिवार)। जैन परंपरा के सर्वाधिक पवित्र अनादि पर्वराज पर्युषण के अवसर पर श्री दिगम्बर जैन समाज डोंगरगांव में अध्यात्म, इतिहास और कला की त्रिवेणी प्रवाहित हो रही है। पूज्य आर्यिका मां श्री 105 तपोमती माताजी ससंघ के पावन सान्निध्य एवं ब्रम्हचारणी पिंकी दीदी के कुशल निर्देशन में आयोजित सांस्कृतिक संध्याएं मात्र मनोरंजन का साधन न बनकर जैन इतिहास, दर्शन और सनातन नैतिक मूल्यों की सजीव पुनर्प्रस्तुति बन गई हैं । इन नाट्य प्रस्तुतियों के माध्यम से नई पीढ़ी को जैन धर्म की समृद्ध परंपरा और महापुरुषों के ऐतिहासिक जीवन-वृत्त से परिचित कराया जा रहा है।
पर्युषण के छठवें दिन आदर्श संस्कार बहू मंडल ने 22 वें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ के जीवन के अत्यंत मार्मिक एवं वैराग्यमयी प्रसंग का मंचन किया गया। जैन पौराणिक आख्यानों के अनुसार द्वारकाधीश भगवान नेमिनाथ की बारात के समय जब बाड़े में बंधे मूक पशुओं का करुण आर्तनाद गूंजा, तो उनके अंतर्मन में करुणा का सागर उमड़ पड़ा ।
मंच पर बारात का राजसी उल्लास, राजुल के साथ विवाह की तैयारियां, पशुओं का हृदयविदारक क्रंदन और अंततः तीर्थंकर के हृदय में जाग्रत वैराग्य के पश्चात गिरनार तीर्थ की ओर प्रस्थान के दृश्यों ने दर्शकों को भाव-विभोर कर दिया।
जैन रामायण का भव्य मंचन
महापर्व के सातवें दिन श्री विद्यासागर पाठशाला की शिक्षिकाओं के मार्गदर्शन में तैयार की गई ‘जैन रामायण’ की भव्य नाट्य प्रस्तुति ने पौराणिक कालखंड की यादें ताजा कर दीं। इस प्रस्तुति का ऐतिहासिक आधार 7वीं शताब्दी के महान दिगंबर आचार्य रविषेण द्वारा रचित कालजयी ग्रंथ ‘पद्मपुराण’ रहा। जैन परंपरा में भगवान श्रीराम को ‘अष्टम बलभद्र’ के रूप में पूजित किया जाता है, जिनका संपूर्ण जीवन अहिंसा, मर्यादा, संयम और कर्म-सिद्धान्त का प्रतीक है। पाठशाला के बच्चों, बेटियों और बहुओं ने पद्मपुराणकालीन प्रसंगों को अपने अभिनय, संगीत और प्रामाणिक वेशभूषा के माध्यम से जीवंत कर दिया। बाल कलाकारों का आत्मविश्वास और सशक्त संवाद अदायगी आचार्य परंपरा और धर्म-संस्कृति के प्रति नई पीढ़ी के बढ़ते रुझान का प्रत्यक्ष प्रमाण बनी ।







