- “छत्तीसगढ़ में दलहन, तिलहन एवं प्राकृतिक खेती” विषय पर किसानों, वैज्ञानिकों एवं नीति-निर्माताओं ने साझा किए विचार
रायपुर (विश्व परिवार)। भारतीय कृषि परंपरा में भगवान श्री बलराम जी का विशेष स्थान है। भगवान बलराम को हल एवं कृषि के प्रतीक के रूप में स्मरण किया जाता है। उनके हाथों में सुशोभित हल किसान के श्रम धरती से उसके गहरे संबंध और कृषि संस्कृति का प्रतीक है। भगवान बलराम जयंती किसान के परिश्रम, कृषि के महत्व तथा धरती और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के प्रति हमारी जिम्मेदारी का स्मरण कराती है। इसी भावना को केंद्र में रखते हुए छत्तीसगढ़ शासन द्वारा भगवान बलराम दिवस को प्रदेश में किसान दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया है। इसी क्रम में स्वामी विवेकानंद सभागार, कृषि महाविद्यालय, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर में “भगवान श्री बलराम जयंती-किसान दिवस” के अवसर पर “छत्तीसगढ़ में दलहन, तिलहन एवं प्राकृतिक खेती” विषय पर राज्य स्तरीय कृषक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह आयोजन कृषि विकास एवं किसान कल्याण तथा जैव प्रौद्योगिकी विभाग, छत्तीसगढ़ शासन, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर, दाऊ वासुदेव चंद्राकर कामधेनु विश्वविद्यालय, दुर्ग एवं महात्मा गांधी उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, दुर्ग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि छत्तीसगढ़ शासन के माननीय कृषि मंत्री राम विचार नेताम थे। कार्यक्रम में तीनों विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की गरिमामयी उपस्थिति रही। इनमें डॉ. गिरिश चंदेल, कुलपति, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर डॉ. आर.आर.बी. सिंह, कुलपति दाऊ वासुदेव चंद्राकर कामधेनु विश्वविद्यालय, दुर्ग तथा डॉ. रवि रतन सक्सेना, कुलपति महात्मा गांधी उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, दुर्ग शामिल रहे। इसके साथ ही राहुल देव, संचालक कृषि, छत्तीसगढ़ शासनय सुरेश चंद्रवंशी, अध्यक्ष, छत्तीसगढ़ कृषक कल्याण परिषदय राजेंद्र नायक, अध्यक्ष, छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंकय सहित कृषि एवं किसान कल्याण से जुड़े अनेक गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे।
भगवान बलराम के कृषि संदेश को आगे बढ़ाने का आह्वान
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए छत्तीसगढ़ कृषक कल्याण परिषद के अध्यक्ष श्री सुरेश चंद्रवंशी ने भगवान बलराम जी के कृषि स्वरूप एवं उनके प्रतीकात्मक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हल जुताई का प्रतीक है, जबकि मूसल कृषि उपज के प्रसंस्करण एवं उसके स्वरूप को बदलने का प्रतीक है। उन्होंने नहर एवं नाली के विस्तार को भी भगवान बलराम जी से जुड़े कृषि योगदान के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि बलराम जयंती का अर्थ केवल भगवान बलराम जी की पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके कृषि एवं श्रम से जुड़े कार्यों को आगे बढ़ाना है। उन्होंने कहा कि यदि किसान, वैज्ञानिक, कृषि विभाग एवं समाज के सभी वर्ग मिलकर कार्य करें तो छत्तीसगढ़ को कृषि के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाया जा सकता है।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि माननीय कृषि मंत्री राम विचार नेताम ने कहा कि प्रदेश में भगवान बलराम दिवस को किसान दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया है। उन्होंने भगवान बलराम जी के स्वरूप का उल्लेख करते हुए कहा कि जिस युग में लोग अस्त्र-शस्त्र के स्थान पर हल और मूसल लेकर चलते थे, वह कृषि एवं श्रम की महत्ता को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ में विभिन्न प्रकार की फसलों की खेती की जा रही है और प्रदेश के किसान प्राकृतिक खेती के माध्यम से भूमि की रक्षा की दिशा में भी कार्य कर रहे हैं। कृषि मंत्री ने रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर विचार करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं और उनके उपयोग का अधिकार सभी का है। इसलिए इनका उपयोग संतुलित एवं जिम्मेदारी के साथ किया जाना चाहिए। उन्होंने जल संसाधनों के अत्यधिक दोहन की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि एक ओर जल का दोहन किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर कई स्थानों पर किसानों एवं आम लोगों को पीने के पानी की समस्या का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों के दुरुपयोग के कारण नदियां और नाले सूखते जा रहे हैं। उन्होंने किसानों को उनकी मेहनत का उचित प्रतिफल दिलाने के लिए कृषि उपज का सही एवं उचित मूल्य उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर भी विशेष जोर दिया।

संचालक कृषि राहुल देव ने कृषि क्षेत्र में विगत वर्षों में हासिल उपलब्धियों की जानकारी देते हुए कहा कि देश में दलहन एवं तिलहन की आवश्यकता को पूरा करने के लिए आयात करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में प्रदेश में इन फसलों के उत्पादन को बढ़ावा देना आवश्यक है। उन्होंने किसानों को दलहन एवं तिलहन की खेती के लिए प्रोत्साहित करते हुए बताया कि धान के स्थान पर दलहन एवं तिलहन फसलों की खेती करने पर किसानों को रू.15,000 प्रति एकड़ की सहायता प्रदान की जाएगी। उन्होंने प्रधानमंत्री दलहन-तिलहन अभियान की जानकारी देते हुए बताया कि इसके अंतर्गत किसान अपनी दलहन एवं तिलहन उपज को निकटस्थ केंद्रों पर बेच सकते हैं तथा अभियान के लिए रू. 1,500 करोड़ के प्रावधान की जानकारी दी। राहुल देव ने किसानों से मिलेट्स की खेती को बढ़ावा देने का भी आह्वान किया, ताकि कृषि विविधीकरण के साथ-साथ लोगों को पौष्टिक खाद्य उपलब्ध कराया जा सके। उन्होंने किसानों को कस्टम हायरिंग सेंटर की सुविधा के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि किसान इन केंद्रों से कृषि यंत्र एवं उपकरण किराये पर लेकर अपनी कृषि लागत एवं श्रम संबंधी समस्याओं को कम कर सकते हैं। उन्होंने वाटरशेड परियोजनाओं के अंतर्गत किए जा रहे कार्यों की जानकारी भी दी। संचालक कृषि ने कहा कि लंबे समय तक रासायनिक खेती किए जाने से भूमि की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। इसलिए प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के साथ-साथ अधिक से अधिक किसानों को इसके लिए प्रशिक्षित एवं जागरूक करने की आवश्यकता है। उन्होंने किसानों से कृषि में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करने तथा खेती की ऐसी पद्धतियों को अपनाने का आह्वान किया, जिनसे भूमि की उत्पादकता एवं कृषि की स्थिरता बनी रहे। भारतीय किसान मोर्चा के अध्यक्ष श्री आलोक सिंह ठाकुर ने प्राकृतिक खेती के बढ़ते महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आने वाले समय में विश्व स्तर पर प्राकृतिक खेती से प्राप्त कृषि उत्पादों का एक बड़ा बाजार विकसित हो सकता है। उन्होंने गौरेला-पेंड्रा क्षेत्र में लगभग 25,000 हेक्टेयर भूमि में विष्णुभोग चावल की प्राकृतिक खेती किए जाने का उल्लेख किया। उन्होंने किसानों से पशुधन को बढ़ावा देने का आह्वान किया और कहा कि पशुधन खेती का महत्वपूर्ण पूरक है तथा प्राकृतिक एवं जैविक खेती को आगे बढ़ाने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. गिरिश चंदेल ने किसानों को प्राकृतिक एवं जैविक खेती की तकनीकों से प्रशिक्षित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि किसानों को केवल प्राकृतिक खेती के बारे में जानकारी देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें इसके व्यावहारिक पहलुओं एवं तकनीकों का प्रशिक्षण भी दिया जाना आवश्यक है, ताकि वे इसे प्रभावी रूप से अपने खेतों में अपना सकें। संगोष्ठी में प्राकृतिक खेती के मूल सिद्धांत, गोपालन, जैविक खाद एवं जैविक सामग्री निर्माण, खरपतवार नियंत्रण, प्रमाणीकरण तथा प्राकृतिक खेती से प्राप्त उपज की मार्केटिंग जैसे विषयों को तकनीकी सत्रों में शामिल किया गया।
कार्यक्रम के प्रथम तकनीकी सत्र में कृषि वैज्ञानिकों द्वारा किसानों को विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर प्रशिक्षण प्रदान किया गया। इसमें छत्तीसगढ़ में दलहन की खेती एवं क्षेत्रीय अनुशंसाएं, तिलहन की खेती एवं क्षेत्रीय अनुशंसाएं, दलहन एवं तिलहन में पौध संरक्षण, जैविक खाद, प्राकृतिक खेती के मूल सिद्धांत एवं गोपालन तथा प्राकृतिक खेती में खरपतवार नियंत्रण जैसे विषय शामिल रहे।
तकनीकी सत्र में डॉ. दीपक चंद्राकर, डॉ. नंदन मेहता, डॉ. वाय.के. मेघम, डॉ. तपस चैधरी, डॉ. गौतम राय एवं डॉ. नितिश तिवारी ने संबंधित विषयों पर किसानों को जानकारी एवं प्रशिक्षण दिया। द्वितीय तकनीकी सत्र में प्राकृतिक खेती के व्यावहारिक अनुभवों एवं तकनीकों पर चर्चा की गई। इसमें विगत तीन वर्षों से प्राकृतिक खेती करने के अनुभव, डी.डी. किसान द्वारा तैयार डॉक्यूमेंट्री का प्रदर्शन, प्राकृतिक खेती में जैविक सामग्री तैयार करने की विधि तथा प्राकृतिक खेती प्रमाणीकरण एवं उपज मार्केटिंग जैसे विषय शामिल रहे। इस सत्र में ओमप्रकाश सेन, ईश्वरी साहू एवं डॉ. गौतम राय द्वारा संबंधित विषयों पर जानकारी दी गई।
इस राज्य स्तरीय कृषक संगोष्ठी की विशेषता यह रही कि इसमें इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुरय दाऊ वासुदेव चंद्राकर कामधेनु विश्वविद्यालय, दुर्ग तथा महात्मा गांधी उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, दुर्ग ने संयुक्त रूप से सहभागिता की। तीनों विश्वविद्यालयों की सहभागिता से कृषि, पशुधन एवं उद्यानिकी से संबंधित विशेषज्ञता को किसानों तक पहुंचाने के लिए एक व्यापक मंच उपलब्ध हुआ। संगोष्ठी में फसल विविधीकरण, दलहन एवं तिलहन उत्पादन, प्राकृतिक एवं जैविक खेती, पशुधन आधारित कृषि, मृदा स्वास्थ्य, जल संरक्षण, कृषि यंत्रीकरण, प्रमाणन एवं बाजार व्यवस्था जैसे विषयों पर विचार-विमर्श हुआ। तकनीकी सत्रों के माध्यम से किसानों को वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक जानकारी प्रदान की गई। कार्यक्रम की निर्धारित समय-सारणी में प्रथम तकनीकी सत्र प्रातः 11ः00 से 12ः30 बजे तक तथा द्वितीय तकनीकी सत्र दोपहर 2ः25 से 4ः30 बजे तक निर्धारित था। संगोष्ठी में किसानों एवं विशेषज्ञों के बीच संवाद के माध्यम से खेती की वर्तमान चुनौतियों और संभावनाओं पर चर्चा हुई। किसानों को दलहन एवं तिलहन उत्पादन बढ़ाने, प्राकृतिक खेती अपनाने, पशुधन को कृषि से जोड़ने, कृषि यंत्रों की उपलब्धता का लाभ लेने तथा जल एवं भूमि जैसे प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए प्रेरित किया गया।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. विवेक कुमार त्रिपाठी द्वारा धन्यवाद ज्ञापन किया गया। उन्होंने कार्यक्रम की सफलता में योगदान देने वाले सभी अतिथियों, कृषि वैज्ञानिकों, अधिकारियों, किसानों, विश्वविद्यालय के शिक्षकों, कर्मचारियों एवं आयोजन से जुड़े सभी सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर आयोजित संगोष्ठी ने किसान-केंद्रित, प्राकृतिक संसाधन आधारित एवं टिकाऊ कृषि विकास की दिशा में सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता को रेखांकित किया। कार्यक्रम का समापन किसानों की समृद्धि, कृषि के सतत विकास तथा छत्तीसगढ़ को कृषि क्षेत्र में अग्रणी बनाने के सामूहिक संकल्प के साथ हुआ।







