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साइबर लॉ एवं डिजिटल साक्ष्य और डिजिटल साक्ष्य की ग्राह्यता पर संगोष्ठी – जिला न्यायालय, बेमेतरा में कलिंगा विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित

बेमेतरा (विश्व परिवार)।  कलिंगा विश्वविद्यालय ने 24 मार्च 2026 को जिला न्यायालय, बेमेतरा में ‘साइबर लॉ, डिजिटल साक्ष्य तथा न्यायालयों में डिजिटल साक्ष्य की ग्राह्यता’ विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया। यह कार्यक्रम न्यायालय परिसर के भीतर अधिवक्ता संघ, बेमेतरा के सौजन्यपूर्ण सहयोग से आयोजित किया गया, जिसने सत्र के संचालन एवं आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस संगोष्ठी में बड़ी संख्या में कार्यरत अधिवक्ताओं ने सक्रिय भागीदारी की। कार्यक्रम की गरिमा माननीय जिला न्यायाधीश अधिवक्ता सरोज नंदन दास, प्रथम अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश अधिवक्ता देवेंद्र कुमार, अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश अधिवक्ता साक्षी दीक्षित तथा मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी अधिवक्ता मोहित सिंह की उपस्थिति से बढ़ी, जो विधिक समुदाय के सशक्त संस्थागत समर्थन को दर्शाती है।
विशेषज्ञ सत्र का संचालन सुश्री विशाखा साखरकर, सहायक प्राध्यापक, विधि संकाय द्वारा किया गया। उन्होंने साइबर लॉ से संबंधित वैधानिक प्रावधानों, डिजिटल साक्ष्य के कानूनी ढांचे, इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों के संग्रहण एवं संरक्षण की प्रक्रियाओं, न्यायालयों में डिजिटल साक्ष्य की ग्राह्यता तथा इस क्षेत्र में हाल के न्यायिक विकासों पर विस्तार से प्रकाश डाला। साथ ही, विधिक कार्यवाही के दौरान डिजिटल साक्ष्य को संभालने एवं प्रस्तुत करने में अधिवक्ताओं द्वारा सामना की जाने वाली व्यावहारिक चुनौतियों पर भी विस्तृत चर्चा की गई।
तकनीक पर बढ़ती निर्भरता और साइबर मामलों में लगातार वृद्धि को ध्यान में रखते हुए, इस चर्चा में आधुनिक विधिक प्रथाओं में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य से संबंधित वैधानिक प्रावधानों, प्रक्रियात्मक आवश्यकताओं एवं न्यायिक मानकों के पालन के महत्व को रेखांकित किया गया।
कार्यक्रम को न्यायपालिका के वरिष्ठ सदस्यों, जिनमें परिवार न्यायालय के न्यायाधीश, विशेष न्यायाधीश, अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश एवं सिविल न्यायाधीश शामिल थे, की उपस्थिति से और अधिक गरिमा प्राप्त हुई, जो विकसित हो रहे विधि क्षेत्रों में निरंतर अधिगम एवं क्षमता निर्माण के प्रति न्यायपालिका के सक्रिय दृष्टिकोण को दर्शाती है।
कलिंगा विश्वविद्यालय समय-समय पर ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन करता रहा है, जो शैक्षणिक संस्थानों और न्यायपालिका के बीच सार्थक संवाद को बढ़ावा देते हैं, जिससे विधिक शिक्षा और न्यायिक कार्यप्रणाली के बीच एक रचनात्मक समन्वय स्थापित होता है।
बार एवं बेंच के सदस्यों से प्राप्त सकारात्मक प्रतिक्रिया से प्रेरित होकर, विश्वविद्यालय अब छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिला न्यायालयों में इसी प्रकार के विषय-केंद्रित कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बना रहा है, ताकि विधि अध्ययन और न्यायालयीन व्यवहार के बीच संबंध को और सुदृढ़ किया जा सके।
संगोष्ठी का समापन धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ तथा विश्वविद्यालय ने पेशेवर विकास को बढ़ावा देने और न्याय वितरण प्रणाली को सुदृढ़ करने के प्रति अपनी निरंतर प्रतिबद्धता को पुनः दोहराया ।

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