धर्म

उपसर्ग कितना भी बड़ा हो समता,क्षमा ,शांति सहनशीलता से कर्मों का क्षय होता है-आचार्य श्री वर्धमान सागर जी

जयपुर  (विश्व परिवार) वात्सल्य वारिधि पंचम पट्टाधीश 108 आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज का जयपुर के विभिन्न मंदिरों उपनगरों में प्रवास चल रहा है 1008 श्री पार्श्वनाथ जिनालय निर्माण नगर में प्रवेश के अवसर पर आयोजित धर्म सभा में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने उपदेश में श्री पार्श्वनाथ भगवान पर 10 भवों जन्मों में कितने उपसर्गों को समता भाव से सहन कर क्षमा भाव रखा मनुष्य जीवन में सबसे बड़ी कमजोरी है मोह और असहनशीलता। मोही जीव छोटी-छोटी बातों में विचलित हो जाता है, क्रोध कर लेता है और कषाय की गांठ बाँध लेता है।लेकिन याद रखें क्रोध आ जाना स्वाभाविक हो सकता है, परंतु क्रोध की गांठ बाँध लेना अत्यंत घातक हैभगवान पार्श्वनाथ के जीवन में कमठ द्वारा भयंकर उपसर्ग आए,फिर भी उन्होंने कभी शांति नहीं छोड़ी।उन्होंने दिखाया कि “उपसर्ग चाहे कितना भी बड़ा हो,समता और शांति से ही कर्मों का क्षय होता है।”जब हम जिनालय में खड़े होते हैं, तो यह याद रखें हम वीतराग भगवान के सामने हैं यहाँ अहंकार, क्रोध, अशांति का कोई स्थान नहीं यदि हम जिनालय में भी सहनशीलता न सीख पाए,तो फिर जिनालय जाने का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।जब कोई संघ (साधु-संत) नगर में प्रवेश करता है पहले उनका सम्मान, सेवा और दर्शन करना चाहिए यह हमारी संस्कार और विनम्रता की पहचान है। राजेश पंचोलिया सुरेश सबलावत के अनुसार आचार्य श्री ने आगे बताया कि दुनिया में सबसे बड़ा रोग है मोह मोह से ममता,ममता से राग-द्वेष और वही दुख का कारण बनता है हम सब कुछ याद रखते हैं पर अपने आत्मा को भूल जाते हैं सच्चा धर्म यही है मैं आत्मा हूँ, शरीर नहीं”
इस भेदज्ञान को जागृत करना ही मुक्ति का मार्ग है।आचार्य श्री ने महत्वपूर्ण सूत्र दिया
मंदिर छोटा या बड़ा नहीं, भाव बड़ा होना चाहिए मकान बड़ा बनाने से नहीं, आत्मा को महान बनाने से जीवन सफल होता है सहनशक्ति, समता और शांति से ही निर्वाण का मार्ग खुलता है अपने जीवन का निर्माण करें,आत्मा को पहचानें, और वीतराग मार्ग पर आगे बढ़ें।”

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