भोपाल (विश्व परिवार)। आचार्य विद्या सागर महाराज की प्रेरणा से डॉक्टर इंजीनियर बन विदेश के बड़े पैकेज को छोड़कर दे रही संस्कृति संस्कारों की रक्षा की सीख गुरु वंदना में भाव विभोर हुई प्रतिभा मंडल की बहने भोपाल गुरु वंदना महोत्सव में गुरु के प्रति श्रद्धा भक्ति आस्था का अदभुत नजारा दिखा जब आचार्य विद्या सागर महाराज के गुणों की वंदना में प्रतिभा स्थली की बहने भाव विभोर हुई, अध्यात्म सरोवर के राजहंस आचार्य विद्या सागर की पूजा में श्रद्धा भक्ति के समर्पण भाव से गुरु वंदना में निकले शब्दों ने, सभी को भाव विभोर कर दिया, प्रवक्ता अंशुल जैन ने बताया आचार्य श्री की प्रेरणा से संस्कृति संस्कारों की पाठशाला प्रतिभा स्थली की उच्च शिक्षित ब्रह्मचारी बहने साथ में बालिकाओं ने सुसज्जित अष्ट द्रव्य से आराधना की, प्रतिभा स्थली की बालिकाओं ने आचार्य श्री के उद्देश ओर संस्मरण के साथ सांस्कृतिक प्रस्तुति के माध्यम से भारतीय संस्कृति संस्कारों को आत्मसात कर सामाजिक समरसता का संदेश दिया दिंगबर जैन पंचायत कमेटी अध्यक्ष पंकज जैन सुपारी निर्माण कमेटी के राकेश जैन ओ एस डी सभी सदस्यों ने शास्त्र भेट किए। आचार्य विद्या सागर महाराज की प्रेरणा से 2006 में प्रतिभा स्थली की शुरुआत हुई जो जबलपुर रामटेक इंदौर डोंगडगढ़ ललितुर में चल रही हे प्रवक्ता अंशुल जैन ने बताया प्रतिभा मंडल की लगभग 400 उच्च शिक्षित बहने जो डाक्टर इंजीनियर के साथ देश विदेश के बड़े पैकेज को त्याग कर आचार्य श्री की प्रेरणा आशीर्वाद से आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत लेकर व्रत संयम की प्रतिमा लेकर बालिकाओं को शिक्षा के साथ भारत की अक्षुण संस्कृति संस्कारों की रक्षा करते हुए देश के प्रति उत्तर दायित्व का निर्वहन करे। प्रतिभा मंडल की सभी बहनों ने एक साथ आचार्य श्री को नमोस्तु कर अपनी भावांजलि में कहा आचार्य श्री के एक एक वचन को पूरा करने जीवन का हर पल आशीर्वाद को कहा गुरु पूर्णिमा के अवसर आशीष वचन में आचार्य समय सागर महाराज ने कहा गुरु के वचनों को आदर भाव से स्वीकार कर आत्मसात करे , मोह के प्रभाव से ही ज्ञान में लचीला पन होता हे, मोह समाप्त होने पर विपरीत ज्ञान भी समीचीन होता हे , वीतरागता के अभाव में ज्ञान की वैल्यू नहीं हे। सम्यक दर्शन उत्पन्न होते ही ज्ञान में समीचीनता आती हे इससे ही आचरण श्रेष्ठ होता हे,, मन ओर ज्ञान का दुरुपयोग दीर्घ काल के लिए पतन का कारण हे, मन का सदुपयोग करोगे तो अल्पकाल में केवल्य ज्ञान का लाभ हो सकता हे आचार्य श्री ने प्रतिभा स्थली की बहनों को देख कहा मात्र ज्ञान नहीं वीतरागता का प्रभाव हे जो पंचम काल में भौतिकता की चकाचौंध में दिख रहा हे जो अहंकार में चूर हे वह अपनी उपस्थिति को ही स्वीकार करता हे , मान क्रोध से भी भयानक हे। आचार्य श्री ने कहा मोह ही हमारा सबसे बड़ा शत्रु हे,, मोह को समाप्त करना खेल नहीं। वो बहुत होनहार हे, जिसके ह्रदय में गुरु विराजमान हे,, गुरु का स्मरण निरपेक्ष भाव से बिना अपेक्षा के लिए करो, इक्षा से कुछ प्राप्त नहीं होता।







