धर्म

“जीवन में संतुलन से ही मधुरता, दूसरों की नकल से बिगड़ते हैं सुर” : निर्यापक मुनि समतासागर जी

कुण्डलपुर (विश्व परिवार)। निर्यापक मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने ‘व्हाट इज लाइफ’ श्रृंखला के अंतर्गत ‘लाइफ इज ए म्यूजिक’ विषय पर जीवन के मर्म को समझाते हुए कहा कि जीवन स्वयं एक संगीत है और आवश्यकता इस बात की है कि हम इसे लयबद्ध करना सीखें। जीवन में सुख-दुःख, उतार-चढ़ाव और अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियां आती रहती हैं, लेकिन इनके बीच संतुलन बनाए रखना ही जीवन को मधुर बनाता है।
मुनि श्री ने कहा कि सूखी लकड़ी के साधारण टुकड़े से बनी बांसुरी जब कुशलता से बजती है तो उससे मधुर संगीत निकलता है। कृष्ण की बांसुरी हमें सिखाती है कि जीवन रूपी खोखले बांस में यदि प्रेम और मृदुलता की फूंक हो तो उससे आनंद का संगीत पैदा हो सकता है। वहीं शिव का डमरू और तांडव सृष्टि के सृजन और विनाश की अनवरत लय का प्रतीक है। सुख हो या दुःख, उतार हो या चढ़ाव, जीवन की गति में संतुलन और लय आवश्यक है।
उन्होंने जैन दर्शन के संदर्भ में जीवन की तुलना सितार से करते हुए कहा कि सितार अपने आप में न सुरीला है और न बेसुरा। उसके तारों को क्रोध में जोर से खींचेंगे तो कर्कश स्वर निकलेगा, लेकिन प्रेम और धैर्य से छूने पर वही तार मधुर संगीत पैदा करेंगे। शरीर और परिस्थितियां सितार हैं, जबकि आत्मा, विचार, शब्द और कर्म उसके तारों को स्पर्श करने वाली उंगलियों के समान हैं। इसे पुद्गल और आत्मा की जुगलबंदी भी कहा जा सकता है।
मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य अपने कर्मों से जीवन रूपी सितार पर जैसी थाप देता है, वैसी ही प्रतिध्वनि उसे प्राप्त होती है। अहंकार, क्रोध, लोभ, भय और अज्ञानता जीवन के बेसुरे स्वर हैं, जबकि सत्य, करुणा, संयम और विवेक की थाप से आनंद और आत्मिक शांति का संगीत पैदा होता है। जैन दर्शन में कर्मों के आगमन को आस्रव तथा उनके रोकने के उपाय को संवर कहा गया है। मन, वचन और काय की प्रवृत्तियों को रोकना गुप्ति है। जिस प्रकार संगीत में दो सुरों के बीच का मौन उसे मधुर बनाता है, उसी प्रकार जीवन में गुप्ति और संवर आत्मिक संगीत को शांत और प्रभावी बनाते हैं। राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं क्षेत्रीय प्रचार मंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि मुनि श्री समतासागर जी महाराज ‘व्हाट इज लाइफ’ श्रृंखला में जीवन के विभिन्न आयामों को आध्यात्मिक दृष्टि से सरल उदाहरणों के माध्यम से समझा रहे हैं।मुनि श्री ने युवाओं को जीवन में संतुलन बनाए रखने की प्रेरणा देते हुए कहा कि सितार के तार को यदि बहुत अधिक कस दिया जाए तो वह टूट सकता है और यदि बिल्कुल ढीला छोड़ दिया जाए तो उससे मधुर स्वर निकलता ही नहीं। आज का युवा करियर, पैसा और सफलता की दौड़ में स्वयं को इतना अधिक कस रहा है कि तनाव और बर्नआउट का शिकार हो रहा है। दूसरी ओर लक्ष्यहीनता के कारण कुछ युवा पूरी तरह ढीले पड़कर अपना समय गंवा रहे हैं। जीवन का अच्छा संगीत तभी निकलता है, जब उसके तार संतुलित हों। स्वयं पर इतना दबाव न बनाएं कि टूट जाएं और न इतने लापरवाह बनें कि जीवन का उद्देश्य ही समाप्त हो जाए।
उन्होंने संगीत के पिच और स्केल का उदाहरण देते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति की अपनी क्षमता और सीमा होती है। आज का युवा दूसरों का स्केल देखकर अपनी जिंदगी जीने का प्रयास कर रहा है। किसी दूसरे की सफलता, जीवनशैली या उपलब्धि को देखकर उसकी नकल करना जरूरी नहीं है। हर व्यक्ति का अपना पिच और स्केल है। अपनी योग्यता और क्षमता के अनुरूप सुर साधेंगे तो जीवन सुरीला होगा, जबकि दूसरों की नकल करने में अपने जीवन के सुर बिगड़ सकते हैं। उन्होंने कहा कि नकल को भी अकल की जरूरत होती है। इसलिए अपनी मौलिकता, वास्तविकता और क्षमता को पहचानकर आगे बढ़ना चाहिए।
मुनि श्री ने कहा कि आज का युवा अपने जीवन को 15 सेकंड की रील की तरह देखना चाहता है। उसे तुरंत सफल, तुरंत वायरल और तुरंत अमीर बनना है। वह प्रतीक्षा नहीं करना चाहता। लेकिन वास्तविक जीवन कोई छोटी रील नहीं, बल्कि एक पूरा म्यूजिक एलबम है। एक एलबम बनने में समय लगता है। उसमें अनेक बदलाव आते हैं। कभी धुन शांत होती है, कभी जोश से भरी होती है। कुछ गाने हिट होते हैं तो कुछ फ्लॉप भी हो जाते हैं। इसी तरह जीवन में हर अनुभव सफलता नहीं देता, लेकिन हर अनुभव कुछ न कुछ सिखाकर जाता है।
उन्होंने कहा कि कोई भी व्यक्ति सीधे गाने के अंतिम अंतरे तक नहीं पहुंचता। शुरुआत के नोट्स पर भी उतनी ही मेहनत करनी पड़ती है। इसलिए जीवन के प्रत्येक चरण को स्वीकार करते हुए उसका आनंद लेना चाहिए। जिस प्रकार कोई व्यक्ति संगीत केवल इसलिए नहीं सुनता कि वह जल्दी समाप्त हो जाए, उसी प्रकार जीवन को भी केवल अंतिम सफलता तक पहुंचने की दौड़ नहीं बनाया जाना चाहिए।
मुनि श्री ने जीवन में ‘सुनने की कला’ को भी महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि एक बेहतरीन ऑर्केस्ट्रा में कुशल संगीतकार अपनी धुन बजाने से पहले दूसरे वाद्ययंत्रों को ध्यान से सुनता है। गिटार वाला ड्रम की लय सुनता है, पियानो वाला बांसुरी के सुर से अपना सुर मिलाता है। सभी एक-दूसरे को सुनते हैं, तभी सामंजस्यपूर्ण संगीत पैदा होता है। आज समस्या यह है कि हर व्यक्ति केवल अपनी बात कहना चाहता है, लेकिन दूसरे को सुनना नहीं चाहता। परिवार, समाज और संबंधों में मधुरता के लिए अपनी बात कहने के साथ दूसरे की बात सुनना भी आवश्यक है।
मुनि श्री समतासागर महाराज ने कहा कि जीवन का अंतिम लक्ष्य केवल बाहरी सफलता नहीं, बल्कि आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानना है। शुद्ध आत्मा में संसार के गम, दुःख और क्लेश उसका मूल स्वभाव नहीं हैं। जब जीव राग-द्वेष से मुक्त होकर अपने स्वभाव में लीन होता है, तब जीवन का सबसे शांत और मधुर संगीत प्रकट होता है। मोक्ष वह अवस्था है, जहां आत्मा अपने स्वाभाविक अनंत आनंद में लीन हो जाती है। यही जीवन के आध्यात्मिक संगीत की पूर्णता है।

Leave A Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Related Posts