नई दिल्ली (विश्व परिवार)। ब्रिक्स सदस्य देशों के घरेलू करेंसी पेमेंट नेटवर्क के बीच एक डिजिटल पुल बनाने का भारत का प्रस्ताव दिल्ली में होने वाली इस ब्लॉक की अगली समिट के एजेंडे में सबसे अहम मुद्दा बन गया है। दक्षिण अफ्रीका की आईओएल न्यूज वेबसाइट पर छपे एक लेख के अनुसार, इस बात पर जोर दिया गया है कि ब्रिक्स देश डॉलर में होने वाले एनर्जी ट्रेड और अमेरिकी फाइनेंशियल इंफ्रास्ट्रक्चर पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं। जब मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ता है, तो हर ब्रिक्स अर्थव्यवस्था को तेल की बढ़ती कीमतों, कैपिटल आउटफ्लो और करेंसी की वैल्यू घटने से झटका लगता है।
डॉलर निर्भरता के प्रभाव और चुनौतियां
इसमें बताया गया है कि रूस पर लगे प्रतिबंधों ने उसे स्विफ्ट से अलग कर दिया है। तेल की कीमतें बढ़ने पर चीन को मैन्युफैक्चरिंग की ज्यादा लागत और एक्सपोर्ट में कम कॉम्पिटिटिवनेस का सामना करना पड़ता है। ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र और इथियोपिया सभी डॉलर की कमी और करेंसी में उतार-चढ़ाव से जूझ रहे हैं। चूंकि आईएमएफ की रैंकिंग डॉलर में नॉमिनल जीडीपी को मापती है, इसलिए रुपया कमजोर होने पर भारत की डॉलर में मापी जाने वाली जीडीपी अपने आप कम हो जाती है। खुद आईएमएफ ने मिडिल ईस्ट की स्थिति के कारण रुपये की लगातार गिरती वैल्यू को ही रैंकिंग में गिरावट की वजह बताया है।
भारत के प्रस्ताव को क्यों मिली अहमियत
फपानो फाशा द्वारा लिखे गए लेख में कहा गया है, “यही वजह है कि भारत द्वारा पेश किए गए पेमेंट-सिस्टम इंटरकनेक्टिविटी प्रस्ताव को इतनी अहमियत मिली है। युद्ध ने एक बुनियादी सच्चाई को उजागर किया है: ब्रिक्स देश एक ऐसे फाइनेंशियल सिस्टम के गुलाम बने हुए हैं जिसे वे कंट्रोल नहीं करते। एक मल्टी-सीबीडीसी ब्रिज, या आपस में जुड़े तेज-पेमेंट सिस्टम, लोकल करेंसी में सीधे सेटलमेंट की सुविधा देंगे, जिससे बीच में डॉलर की जरूरत नहीं पड़ेगी – और सदस्य देशों को उस तरह की करेंसी-आधारित रैंकिंग की समस्या से बचाया जा सकेगा जिसका सामना भारत ने अभी-अभी किया है।”
कॉमन करेंसी नहीं, बल्कि वैकल्पिक इंफ्रास्ट्रक्चर
इसमें बताया गया है कि अहम बात यह है कि यह किसी कॉमन ब्रिक्स करेंसी के बारे में नहीं है – एक ऐसा विचार जिसने ब्लॉक को बांट दिया है और जिस पर अमेरिका ने टैरिफ लगाने की धमकी दी है। यह फंक्शनल डी-डॉलरलाइजेशन के बारे में है, जिसमें वैकल्पिक इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना शामिल है ताकि जब अगला संकट आए, तो ब्रिक्स देश अपनी जीडीपी रैंकिंग को अचानक गिरते देखे बिना ट्रेड जारी रख सकें।
मौजूदा पेमेंट सिस्टम की समस्याएं और प्रस्तावित समाधान
इस लेख में यह भी बताया गया है कि अभी ब्रिक्स सदस्यों के बीच पेमेंट के लिए पैसा अक्सर अमेरिकी बैंकों से होकर गुजरता है, इसे क्लियर होने में कई दिन लगते हैं और 3-5 प्रतिशत तक फीस लगती है। प्रस्तावित सिस्टम लोकल करेंसी में सीधे और लगभग तुरंत सेटलमेंट की सुविधा देगा। इसमें ब्लॉकचेन जैसी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाएगा ताकि बिना किसी बिचौलिए के दोनों पक्षों को एक साथ पेमेंट मिल सके। इसमें किसी एक करेंसी को बदला नहीं जाएगा; इसके बजाय, लेख में बताया गया है कि हर देश की डिजिटल करेंसी दूसरी करेंसी से “बात करना” सीखती है।







