कुण्डलपुर (विश्व परिवार)।”जीवन सभी को मिलता है,लेकिन मिले हुए जीवन को सही ढंग से समझना सभी के लिए संभव नहीं हो पाता,जीवन को जिसने समझ लिया, उसका जीवन संगीत बन जाता है और जो जीवन को समझ नहीं पाता, उसका जीवन स्वयं के लिए भी और अपने साथ रहने वालों के लिए भी सिरदर्द बन जाता है” उपरोक्त उद्गार जैन तीर्थ सिद्धक्षेत्र कुण्डलपुर में बड़े बाबा के पावन दरबार में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए निर्यापक श्रमण मुनि श्री समता सागर जी महाराज ने व्यक्त किये!राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी एवं क्षेत्रीय प्रचार मंत्री जयकुमार जैन जलज ने बताया कि धर्मसभा में देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए श्रद्धालुओं ने बड़ी श्रद्धा और भक्ति के साथ बडे बाबा के चरणोँ का अभिषेक एवं शाँतिधारा की इस अवसर पर मध्यप्रदेश के विभिन्न अँचलोँ से तथा राजस्थान,महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश सहित विभिन्न प्रदेशों से आए अनेक परिवारों ने कुण्डलपुर में बड़े बाबा के दर्शन, तीर्थ वंदना और मुनिसंघ के सान्निध्य का लाभ प्राप्त किया।मुनि श्री ने सभी श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि अपने द्रव्य, समय और जीवन का सर्वोत्तम उपयोग करें। इस दुर्लभ मनुष्य जीवन को सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र की आराधना में लगाएँ। खान-पान में शुद्धता रखें,अभक्ष्य वस्तुओं का त्याग करें और छोटे-छोटे नियमों का पालन करें, क्योंकि छोटे नियम ही आगे चलकर जीवन में बड़े परिवर्तन का आधार बनते हैं।
उन्होंने विशेष रूप से बच्चों को भी शुद्ध और सात्त्विक खान-पान की आदतें देने का संदेश दिया। फास्ट फूड एवं अशुद्ध खाद्य पदार्थों से सावधान रहने की प्रेरणा देते हुए उन्होंने कहा कि भोजन की शुद्धता स्वास्थ्य और धर्म—दोनों की दृष्टि से आवश्यक है।स्वयं भी अभक्ष्य वस्तुओं से बचें और बच्चों को भी इनसे बचाने का प्रयास करें।
मुनि श्री ने उपस्थित श्रद्धालुओं और उनके परिवारों को आशीर्वाद देते हुए कहा कि जीवन को केवल बाहरी साधनों और सुविधाओं तक सीमित न रखें, बल्कि अपने भीतर स्थित आत्मतत्त्व को पहचानें। साधनों के स्वामी बनें, उनके गुलाम नहीं। धर्म, शास्त्र और गुरु-सान्निध्य से प्राप्त जीवन-दृष्टि को व्यवहार में उतारते हुए आत्मकल्याण की दिशा में निरंतर आगे बढ़ें।
उन्होंने सभी श्रद्धालुओं को धर्मभावना, आत्मचिंतन और आत्मकल्याण की निरंतर प्रगति के लिए मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। मुनि श्री ने कहा कि जीवन की वास्तविक समझ प्राप्त करने के लिए आध्यात्मिक रुचि आवश्यक है। बाहरी विज्ञान शरीर और भौतिक पदार्थों की जानकारी देता है, लेकिन धर्म और अध्यात्म का विज्ञान मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप से परिचित कराता है। संसार में सबसे महत्वपूर्ण तत्त्व जीव तत्त्व है। जीव में जानने और देखने की सामर्थ्य है। सुख-दुःख, अच्छे-बुरे परिणाम और संसार की समस्त गतिविधियाँ जीव के अस्तित्व से जुड़ी हुई हैं। इसलिए स्वयं को जीव और आत्मतत्त्व के रूप में पहचानना तथा अपने शुद्ध स्वरूप की ओर आगे बढ़ना ही जीवन का सबसे बड़ा सार है। मुनि श्री ने कहा कि विज्ञान ने मनुष्य को अनेक साधन और सुविधाएँ प्रदान की हैं, लेकिन सुविधा और शांति दोनों एक ही बात नहीं हैं। विज्ञान सुविधा दे सकता है, परंतु शांति की गारंटी नहीं दे सकता। पहले आवश्यकता आविष्कार की जननी हुआ करती थी,लेकिन आज कोई नया आविष्कार होने के बाद मनुष्य उसके बिना भी अपनी आवश्यकता महसूस करने लगता है। आवश्यकता हो या न हो, नई वस्तुओं को प्राप्त करने और उनके प्रदर्शन की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।उन्होंने कहा कि विज्ञान को वरदान या अभिशाप बनाने का निर्णय स्वयं मनुष्य के हाथ में है। यदि मनुष्य साधनों का उपयोग करता है तो विज्ञान वरदान है,लेकिन यदि वह उनके उपभोग और आसक्ति में फँस जाता है तो वही विज्ञान अभिशाप बन जाता है। उपयोग करने वाला व्यक्ति साधनों का स्वामी रहता है, जबकि उपभोग और आसक्ति में पड़ने वाला स्वयं साधनों का गुलाम बन जाता है।मुनि श्री ने शरीर को भी आत्मा को मिला हुआ एक महत्वपूर्ण साधन बताया। उन्होंने कहा कि बाहरी साधनों के समान यह शरीर भी जीवन की साधना के लिए मिला है। मनुष्य को विचार करना चाहिए कि वह शरीर का उपयोग कर रहा है या शरीर और इंद्रियों के विषयों के उपभोग में स्वयं को खो रहा है। शरीर के प्रति अत्यधिक आसक्ति मनुष्य को इंद्रिय विषयों का अधीन बना देती है, जबकि यह आत्मबोध कि “मैं शरीर नहीं, आत्मतत्त्व और जीव द्रव्य हूँ”, जीवन की दिशा बदल सकता है।उन्होंने कहा कि शरीर का मिलना कोई पहली घटना नहीं है। संसार के प्रवाह में जीव को अनंत बार शरीर प्राप्त हुए हैं और यदि कर्मों से मुक्ति नहीं मिली तो आगे भी शरीर मिलते रहेंगे। इसलिए मनुष्य जीवन की वास्तविक दुर्लभता केवल मनुष्य जन्म प्राप्त कर लेने में नहीं है। मनुष्य जीवन तब दुर्लभ और सार्थक बनता है, जब इस पर्याय को पाकर आत्मकल्याण का लाभ उठाया जाए।मुनि श्री ने कहा कि वर्तमान समय में मनुष्य के पास साधनों की कोई कमी नहीं है, लेकिन शांति का अभाव बढ़ता जा रहा है। साधन मनुष्य को सुविधा तो दे सकते हैं, लेकिन वास्तविक शांति नहीं। जिसके पास धर्म के प्रति विश्वास, आध्यात्मिक दृष्टि और अंतर्मन की शुद्धता है, वह सीमित साधनों में भी संतोष और शांति का अनुभव कर सकता है। इसके विपरीत, अपार साधनों के बीच रहने वाला व्यक्ति भी अशांत मन के कारण चैन की नींद से वंचित रह सकता है।उन्होंने धन की सीमाओं को स्पष्ट करते हुए कहा कि पैसा पुस्तक दे सकता है, लेकिन ज्ञान नहीं; पैसा चश्मा दे सकता है, लेकिन दृष्टि नहीं; पैसा बिस्तर दे सकता है, लेकिन नींद नहीं; पैसा भोजन दे सकता है, लेकिन भूख नहीं और पैसा औषधियाँ दे सकता है, लेकिन आरोग्य नहीं। वास्तविक जीवन-दृष्टि धर्म, शास्त्रों और गुरुजनों के सान्निध्य से प्राप्त होती है।मुनि श्री ने कहा कि सिद्धक्षेत्र कुण्डलपुर और बड़े बाबा का पावन दरबार श्रद्धालुओं को ऐसी ही जीवन-दृष्टि प्रदान करता है। संसार में अनेक लोग अपने अवकाश और छुट्टियों का उपयोग पर्यटन एवं मनोरंजन में करते हैं, लेकिन वे श्रद्धालु वास्तव में भाग्यशाली हैं जो अपने समय का सदुपयोग तीर्थयात्रा, धर्माराधना और गुरु-सान्निध्य में करते हैं।







