धर्म

“जीवन केवल समय काटने का नाम नहीं, स्वयं को जानने का निरंतर प्रयोग है” :- निर्यापक श्रमण मुनि श्री समता सागर जी

कुण्डलपुर  (विश्व परिवार)। जीवन क्या है? क्या हम वास्तव में जीवन जी रहे हैं या केवल समय काट रहे हैं? यदि जीवन को विज्ञान कहा जाए तो इसके सत्य को जानने के लिए कौन-से प्रयोग किए जाएं? इन प्रश्नों को केंद्र में रखते हुए निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने कहा कि जीवन एक विज्ञान है और इस विज्ञान को समझने के लिए मनुष्य को अपने जीवन में निरंतर प्रयोग करने होंगे, उन प्रयोगों से ही परिणाम मिलते हैं और बार-बार जब एक जैसे परिणाम प्राप्त होते हें तो वही निष्कर्ष सिद्धांत का रूप लेते हैं। राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं क्षेत्रीय प्रचार मंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि कुण्डलपुर में निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज के द्वारा “व्हाट इज लाईफ” ‘जीवन क्या है पर’ प्रवचन श्रृंखला चल रही है, उसके माध्यम से जीवन को आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक दृष्टि से समझने का अवसर श्रद्धालुओं को मिल रहा है,
मुनि श्री ने आगे कहा कि भौतिक विज्ञान ने मनुष्य के जीवन को सुविधाओं से भर दिया है।धरती पर चलने वाले वाहन, आकाश में उड़ने वाले साधन, समुद्र में चलने वाले जहाज, अंतरजाल और दूरभाष जैसी सुविधाएं विज्ञान ने दीं तथा मनुष्य अन्य ग्रहों तक पहुंच गया, लेकिन मनुष्य अपनी अंतहीन इच्छाओं से बाहर निकलकर स्थायी रूप से सुखी कैसे हो, असफलता और अस्वीकृति के भय से मुक्त कैसे हो तथा जीवन को सार्थक ढंग से कैसे जिए—इन प्रश्नों का पूर्ण समाधान विज्ञान नहीं दे पाया?उन्होंने कहा कि विज्ञान ने बाहरी संसार की यात्रा के अनेक साधन दिए, लेकिन अपने भीतर की यात्रा करने की विद्या मनुष्य को स्वयं सीखनी होगी। उन्होंने कहा कि सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि मनुष्य अपना जीवन जी रहा है या केवल वक्त काट रहा है। समय व्यतीत करना और जीवन को सार्थक बनाना अलग-अलग बातें हैं। मुनि श्री ने जैन सिद्धांतों की वैज्ञानिकता समझाते हुए कहा कि शुद्ध वस्तु के लिए मनुष्य अधिक मूल्य देने को तैयार रहता है। इसी प्रकार तीर्थंकर भगवंतों द्वारा बताए गए सिद्धांत साधारण विचार नहीं हैं, बल्कि चौबीस तीर्थंकरों की अनुभूति, साधना और आत्मानुभव से छनकर सामने आए निष्कर्ष हैं। इसलिए इन्हें केवल जैन समाज तक सीमित नहीं समझना चाहिए, बल्कि ये जन-जन के कल्याण के सिद्धांत हैं।उन्होंने वैज्ञानिक पद्धति को आध्यात्मिक साधना से जोड़ते हुए कहा कि वैज्ञानिक के मन में जब किसी सत्य को जानने की तीव्र जिज्ञासा होती है तो वह सबसे पहले अवलोकन करता है। वह अपने पूर्वाग्रहों, पसंद-नापसंद और तत्काल प्रतिक्रिया को अलग रखकर वस्तुस्थिति को जैसा है, वैसा देखता है। जैन दर्शन में यही स्थिति ज्ञाता-द्रष्टा भाव कहलाती है—जानो, देखो और अनुभव करो, लेकिन अनावश्यक रूप से उसमें लिप्त मत हो।इसके बाद आता है प्रयोग। मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य की आत्मा और मन ही उसकी प्रयोगशाला हैं। जैसे वैज्ञानिक प्रयोगशाला में विभिन्न पदार्थों की प्रतिक्रिया देखकर निष्कर्ष निकालता है, वैसे ही मनुष्य अपने भीतर उठने वाले क्रोध, अहंकार, भय, द्वेष, तुलना और जलन जैसे भावों पर प्रयोग कर सकता है। क्रोध का भाव आए तो क्षमा, करुणा और प्रेम का प्रयोग करके देखें कि परिणाम क्या आता है।उन्होंने पहली जिज्ञासा रखी कि जब कोई हमारी बात नहीं मानता या हमसे सहमत नहीं होता तो हम तुरंत क्रोध से क्यों भर जाते हैं? अवलोकन करने पर पता चलता है कि हमारा अहंकार अपनी बात को ही अंतिम सत्य मानना चाहता है। सामने वाला सहमत नहीं होता तो अहंकार और अपमान-बोध सक्रिय हो जाते हैं।इसके समाधान के लिए मुनि श्री ने स्याद्वाद का प्रयोग बताया। स्वयं से कहें—उसका दृष्टिकोण उसकी समझ से सही है और मेरा दृष्टिकोण मेरी समझ से सही है। दोनों कथन सापेक्ष हैं। स्याद्वाद का दृष्टिकोण अपनाने पर वैचारिक मतभेद युद्ध का रूप नहीं लेते और मतभेद मनभेद बनने से बच जाते हैं।
उन्होंने इसके साथ अनित्य भावना और अनियत भावना के प्रयोग की बात कही। संसार की प्रत्येक वस्तु परिवर्तनशील और नाशवान है। घर, धन, यौवन और परिस्थितियां स्थायी नहीं हैं। जब यह बोध जागता है तो अहंकार कमजोर पड़ता है। संसार में कोई भी वस्तु स्थायी रूप से हमारी नहीं है, यहां तक कि शरीर भी परिवर्तनशील है, तो फिर अहंकार किस बात का? इन भावनाओं के चिंतन से अहंकार कम होने के साथ करुणा और सहयोग की भावना विकसित होती है।
दूसरी जिज्ञासा आधुनिक जीवन से जुड़ी है—महंगी कार, सुंदर घर या दूसरों की आकर्षक अवकाश यात्राओं के लघु वीडियो देखकर अपनी जिंदगी अधूरी क्यों लगने लगती है? मुनि श्री ने कहा कि इसका कारण वस्तुओं की कमी नहीं, बल्कि दूसरों से अपनी तुलना करने की प्रवृत्ति है। दूसरे का घर, कार या जीवन अधिक अच्छा दिखाई देता है और व्यक्ति अपनी उपलब्धियों को छोटा समझने लगता है। इस स्थिति में अपरिग्रह का प्रयोग करने की प्रेरणा देते हुए उन्होंने कहा कि अपरिग्रह का अर्थ केवल वस्तुओं को जोड़ना छोड़ देना नहीं है, बल्कि वस्तुओं के प्रति अत्यधिक लगाव को कम करना भी है। जब वस्तुओं के प्रति आसक्ति कम होगी तो दूसरों से तुलना करने की प्रवृत्ति और उससे पैदा होने वाली जलन भी धीरे-धीरे समाप्त होने लगेगी।
उन्होंने नौकर्म पैकेज वितरण का सिद्धांत समझाते हुए कहा कि जीवन में जो परिस्थितियां हमारे सामने आती हैं, वे कर्मों के परिणामस्वरूप प्राप्त होने वाले पैकेज की तरह हैं। अब उस परिस्थिति को देखकर तत्काल प्रतिक्रिया करने के बजाय उसे समझना और स्वीकार करना सीखना होगा। यदि हम हर परिस्थिति पर प्रतिक्रिया करते हैं तो वही प्रतिक्रिया नए कर्म का कारण बनती है और कर्म का यह चक्र आगे भी चलता रहता है। इसलिए परिस्थिति सामने आए तो प्रतिक्रिया नहीं, सजग प्रत्युत्तर देना है।
तीसरी जिज्ञासा पुरानी कड़वी स्मृतियों को लेकर है। मुनि श्री ने कहा कि अतीत जीवन की उस पुस्तक का पृष्ठ है जो लिखा जा चुका है। उसे बदला नहीं जा सकता, लेकिन मनुष्य बार-बार उसी पृष्ठ को खोलकर वर्तमान को दुखी करता रहता है। अपेक्षा पूरी न होने से उत्पन्न मान और भय पुरानी घटनाओं की स्मृतियों को सक्रिय करते हैं और कड़वाहट पुनः जाग जाती है।
इसके समाधान के लिए उन्होंने फिर अनित्य भावना का प्रयोग बताते हुए कहा कि कोई व्यक्ति या परिस्थिति स्थायी नहीं है। इसके साथ आस्रव भावना का चिंतन करें। जिस पुरानी घटना को बार-बार याद करके उसी भाव में डूबेंगे, उसी प्रकार के भावों को बार-बार पुष्ट करेंगे। इसलिए अतीत से सीख लें, लेकिन उसकी कड़वाहट को वर्तमान में जीवित न रखें। मुनि श्री ने कहा कि इन प्रयोगों से एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलता है कि जीवन रुकने का नाम नहीं, बल्कि निरंतर बहती हुई धारा है। जब तक मनुष्य की आंतरिक प्रयोगशाला में जागरूकता और आत्मविश्वास के साथ आत्मशुद्धि के प्रयोग जारी हैं, तब तक उसकी चेतना जीवंत है। ऐसा व्यक्ति परिस्थितियों पर प्रतिक्रिया नहीं करता, बल्कि संतुलित प्रत्युत्तर देता है। वह अपने सभी सांसारिक कर्तव्यों को निभाता है, लेकिन वैज्ञानिक की तरह कर्म करता है और परिणाम से अनावश्यक रूप से बंधता नहीं। उन्होंने कहा कि तीर्थंकर भगवंतों ने बाहरी प्रयोगशाला में नहीं, बल्कि अंतरजगत को अपनी प्रयोगशाला बनाकर आत्म-विज्ञान के प्रयोग किए। अपनी चेतना, भावों और आत्मा पर किए गए उन्हीं प्रयोगों से उन्हें जो निष्कर्ष प्राप्त हुए, वे आज भी मनुष्य को सत्य और आत्मशुद्धि का मार्ग दिखाते हैं।
मुनि श्री ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन का वैज्ञानिक बने। जिज्ञासा करें, अवलोकन करें, प्रयोग करें और निष्कर्ष तक पहुंचें। सबसे महत्वपूर्ण चिंतन यह हो—“मैं शरीर और विचारों से परे एक शुद्ध चेतना हूं।” इस भाव का बार-बार चिंतन मनुष्य को भीतर की शांति और आनंद की ओर ले जाता है।
उन्होंने कहा कि आधुनिक विज्ञान ने बाहरी संसार की अनेक शक्तियों को समझ लिया है, लेकिन चेतना का रहस्य आज भी उसके लिए चुनौती बना हुआ है। जड़ पदार्थ को समझने वाले मनुष्य को अब उस चेतना को समझने की दिशा में भी बढ़ना होगा, जिसने जड़ संसार को जानने की क्षमता दी है।

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