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राघौगढ़ में श्रमण धारा प्रवचन माला: पांच पापों में सबसे बड़ा परिग्रह

  • मुनि श्रमण सागर बोले- परिग्रह पर नियंत्रण करें, पांच पापों से बचें

राघौगढ़ (विश्व परिवार)। धर्मनगरी राघौगढ़ में ससंघ चातुर्मास कर रहे महान तपस्वी एवं ओजस्वी वक्ता, बुंदेली महाकवि मुनि श्रमण सागर जी महाराज ने श्रमण धारा प्रवचन माला के अंतर्गत आचार्य विद्यासागर सभागार में ‘पापों से कैसे बचें’ विषय पर मंगल प्रवचन दिए।

मुनि श्रमण सागर जी महाराज ने कहा कि जैन धर्म में पांच पापों का उल्लेख किया गया है। इनमें हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह शामिल हैं। परिग्रह की प्रवृत्ति के कारण ही अन्य सभी पापों की उत्पत्ति होती है। उन्होंने कहा कि पांच पापों में सबसे बड़ा पाप परिग्रह है, इसलिए व्यक्ति को अपनी परिग्रह की प्रवृत्ति पर नियंत्रण रखना चाहिए।

मुनिराज ने जैन धर्म में बताए गए दस धर्म लक्षणों का उल्लेख करते हुए कहा कि इनमें उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, सत्य, शौच, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य शामिल हैं। इन दस धर्मों में ब्रह्मचर्य को प्रमुख माना गया है। व्यक्ति के अंदर विकारी भाव आने और कुदृष्टि के कारण ब्रह्मचर्य का पालन कठिन हो जाता है।

उन्होंने कहा कि मुनिराज कठोर तपस्या करते हुए विपरीत लिंग के व्यक्तियों से एकांत में न मिलकर ब्रह्मचर्य धर्म का पालन करते हैं।

मन पर नियंत्रण करना सबसे बड़ा तप

मुनि श्रमण सागर जी महाराज ने जैन धर्म में वर्णित तीन गुप्तियों की जानकारी देते हुए कहा कि मन गुप्ति, वचन गुप्ति और काय गुप्ति तीन गुप्तियां हैं। इनमें मन को सबसे प्रमुख माना गया है, क्योंकि मन में निरंतर विचार आते रहते हैं। ऐसे में मन पर नियंत्रण करना सबसे बड़ा तप है।

उन्होंने भगवान आदिनाथ, भगवान बाहुबली और भरत चक्रवर्ती का उदाहरण देते हुए कहा कि भगवान आदिनाथ को मन को नियंत्रित कर तपस्या करते हुए केवलज्ञान प्राप्त करने में 1000 वर्ष लगे। उनके सुपुत्र भगवान बाहुबली को मन पर नियंत्रण कर केवलज्ञान प्राप्त करने में एक वर्ष लगा, जबकि दूसरे सुपुत्र भरत चक्रवर्ती ने मन को नियंत्रित कर एक घंटे में केवलज्ञान प्राप्त कर लिया।

मोहनीय कर्म को जीतना जरूरी

मुनिराज ने जैन दर्शन में बताए गए आठ कर्मों का उल्लेख करते हुए कहा कि इनमें मोहनीय कर्म प्रमुख है। जिसने मोहनीय कर्म को जीत लिया, उसने आठों कर्मों को जीत लिया।

उन्होंने धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे पांच पापों से बचें, दस धर्मों का पालन करें, तीन गुप्तियों को अपनाएं और आठ कर्मों से बचते हुए आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ें।

रुठियाई समाज ने चातुर्मास के बाद नगर आगमन का दिया निमंत्रण

धर्मसभा में जैन समाज रुठियाई के अध्यक्ष अशोक कुमार जैन, पूर्व अध्यक्ष राजेश कुमार जैन ‘राजू’, जैन मिलन के अध्यक्ष अमित जैन ‘शेंकी’ सहित शिष्टमंडल ने मुनिराज के चरणों में श्रीफल भेंट कर चातुर्मास उपरांत रुठियाई नगर पधारने का आग्रह किया।

इस अवसर पर जैन समाज राघौगढ़ के अध्यक्ष सिंघई अशोक कुमार भारिल्य के नेतृत्व में रुठियाई से पधारे श्रेष्ठीजनों का माला पहनाकर एवं दुपट्टा डालकर सम्मान किया गया।

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