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जैनधर्म के दशलक्षण / पर्यूषण महापर्व का शुभारम्भ 16 सितम्बर बुधवार से

  • कलुषित आत्मा को पवित्र बनाने के लिए जैन श्रावक करेंगे धर्म-साधना – विशाल जैन पवा।

ललितपुर (विश्व परिवार)। पावस के शुभ मास में हरितालिका तीज और गणेश चतुर्थी के बाद भाद्रपद मास में शुक्ल पक्ष की पंचमी से चतुर्दशी तक जैनधर्म का दशलक्षण / पर्यूषण महापर्व मनाया जाता हैं। जो 16 सितम्बर बुधवार से 25 सितम्बर 2026 शुक्रवार तक चलेगा। यह महापर्व माघ एवं चैत्र मास में भी आता है लेकिन विशेष रूप से श्रद्धा-भक्ति के साथ यह भाद्रपद (भादों) के महीने में ही धूमधाम से मनाया जाता है क्योंकि इस दौरान जैन साधु-संतों का चातुर्मास चल रहा होता है। अनेक स्थानों पर चतुर्विध संघ के निर्देशन में श्रावक संस्कार शिविरों का आयोजन किया जाता है। जिसमें श्रावक घर-परिवार छोड़कर दस दिनों तक धर्म साधना करते हैं। इन दिनों श्रावक अपनी कलुषित आत्मा को पवित्र बनाने के लिए धर्म-साधना करते हैं। जिसके लिए उत्तम क्षमा मार्दव आर्जव और शौच धर्म को धारण कर सत्य और संयम के रास्ते तप और त्याग के द्वारा आकिंचन धर्म को स्वीकार कर ब्रह्मचर्य की साधना की जाती है।
दस दिन तक मंदिरों में अभिषेक-शांतिधारा पूजन-विधान का दायरा प्रतिदिन की अपेक्षा बढ़ाया जाता है। सभी सप्त व्यसनों का त्याग कर आठ मूलगुणों का पालन करते हुए देव पूजा, गुरु उपासना, स्वाध्याय, संयम, जप – तप और दान आदि करते हैं।
इन दिनों उपवास या एकासन आहार करने की परम्परा है। सायं काल मंदिरों में सामूहिक आरती शास्त्र प्रवचन के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम विशेष आकर्षण का केंद्र होते हैं।
पर्यूषण महापर्व में प्रथम चार दिन चारों प्रकार की कषाय छोड़कर धर्म मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। इसके 22 दिन पूर्व से सोलह कारण, प्रथम पाँच दिन पंचमेरु, अगले तीन दिन नंदीश्वर द्वीप, अगले तीन दिन रत्नत्रय एवं उसके बाद क्षमावाणी का पूजन-विधान कर महापर्व मनाते हैं।
दशलक्षण धर्म का पहला दिन उत्तम क्षमा का होता है जो हमें क्रोध से बचने का संदेश देता है। क्रोध आत्मिक उन्नति में बाधक एवं मनुष्य के पतन का कारण बनता है। इसके रहते हमें कभी आत्मा का बोध नहीं हो सकता। अतः क्रोध को जीतना सबसे बड़ा धर्म है जिसे उत्तम क्षमा कहते हैं। यह कहने और सुनने में तो अच्छा लगता है लेकिन क्षमा को स्वीकार करना बहुत कठिन है जो जीवन के मार्ग को सुगम बना देता है।
दूसरा दिन उत्तम मार्दव का होता है, जो हमें आठ प्रकार के मदों से दूर रहकर अभिमान को तजने की प्रेरणा देता है। इससे जीवन में मृदुता आती है जो हमें विनम्र बनाती है।
तीसरा दिन उत्तम आर्जव का होता है, जो हमें छल-कपट को छोड़कर मायाचारी से दूर रहने के लिए प्रेरित करता है। यह हृदय में ऋजुता को स्थापित करता है एवं स्वयं को मायाजाल में फँसने से बचाता है।
चौथा दिन उत्तम शौच का होता है, जो हमें केवल बाह्य स्वच्छता नहीं अपितु लोभ और लालच से दूर रहकर आंतरिक पवित्रता एवं संतोष की प्रेरणा देता है। लोभ को पाप का बाप कहा जाता है। इसके कारण ही सभी कषाएँ जागृत होती हैं, लोभ के वशीभूत हो हम मायाचारी करते हैं। इसके बाद जब इच्छा पूर्ण हो जाती है तो अभिमान आ जाता है और इच्छा पूर्ण न होने पर क्रोध आता है। हमें अपने जीवन में शुचिता को ग्रहण करना चाहिए। इसी दिन जैन धर्म के 9वें तीर्थंकर भगवान पुष्पदंत नाथ (सुविधिनाथ जी) का मोक्ष कल्याणक महामहोत्सव मनाया जाता है।
इस प्रकार क्रोध, मान, माया और लोभ के चार-चार भेदों से 16 कषाय तथा नौ नोकषाय कुल 25 कषाय के स्वरूपों को समझते हुए उनसे ऊपर उठकर जीवन में समता को धारण करना होगा। जिससे भावों की परिणति सरल होगी।
पाँचवाँ दिन उत्तम सत्य का होता है। सत्य और अहिंसा को धर्म का मूल कहा गया है। सत्य के अभाव में व्यक्ति भ्रम में जीवन यापन करता है और 84 लाख योनियों में भटकता रहता है।
छटवाँ दिन उत्तम संयम का होता है जो धर्म मार्ग पर चलने का दूसरा उपाय है। संयम मनुष्य को विवेकपूर्ण और अनुशासित जीवन जीने की प्रेरणा देता है तथा पंचेन्द्रियों के विषयों के प्रति आसक्ति को कम करता है। बिना संयम के मनुष्य को पशु के समान कहा गया है। जोश में आकर भी होश न खोना संयम है। जो हमें सभी प्राणियों में श्रेष्ठ और बुद्धिजीवी बनाता है। इसी दिन सुगंध दशमी महापर्व मनाया जाता है जिसको लेकर महिलाओं में विशेष उत्साह देखने को मिलता है।
सातवाँ दिन उत्तम तप का होता है। यह हमें 12 प्रकार के बाह्य एवं अंतरंग तप के माध्यम से आत्मशुद्धि का मार्ग दिखाता है।
आठवाँ दिन उत्तम त्याग का होता है जो परिग्रह को कम करने का साधन है। यह हमारे अंतस में परोपकार की भावना विकसित करने की प्रेरणा देता है तथा पात्र व्यक्ति को अभय औषधि आहार और शास्त्र दान देने का बोध कराता है, जिसे श्रेष्ठ दान कहते हैं।
नवाँ दिन उत्तम आकिंचन होता है, जो हमें राग-द्वेष से मुक्त ही नहीं करता अपितु आत्मा और शरीर के भेद को बताने वाला है। यह धर्म हमें सिखाता है कि आत्मा इस शरीर से भिन्न है। इसमें 14 अंतरंग एवं 10 बाह्य कुल 24 प्रकार के परिग्रहों का त्याग किया जाता है।
अंतिम और दसवाँ दिन उत्तम ब्रह्मचर्य का होता है। शुद्ध आत्मा में विचरण या रमण करना ब्रह्मचर्य है। इस दिन अनंत चतुर्दशी महापर्व एवं जैनधर्म के 12 वें तीर्थंकर वासुपूज्य स्वामी का मोक्ष कल्याणक महामहोत्सव मनाया जाता है।
दशलक्षण महापर्व के समापन के पश्चात् आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को क्षमावाणी महापर्व मनाया जाता है। इस पावन अवसर पर जैन धर्मावलंबी वर्षभर में जाने-अनजाने हुई भूलों, अपराधों एवं कटु व्यवहार के लिए मन, वचन और काय से एक-दूसरे से क्षमा याचना करते हैं तथा दूसरों को भी हृदय से क्षमा करते हैं। परंपरानुसार “मिच्छामि दुक्कडम्” अथवा “उत्तम क्षमा” कहकर परस्पर क्षमायाचना की जाती है और बड़ों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया जाता है।

 

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