- पर्युषण महापर्व के दूसरे दिन उत्तम मार्दव धर्म का संदेश; बोले—जहां णमोकार है, वहां अहंकार नहीं
छत्रपति संभाजीनगर (विश्व परिवार)। पर्वों के पर्वराज पर्युषण महापर्व के दूसरे चरण ‘उत्तम मार्दव धर्म’ के अवसर पर पुष्पगिरी तीर्थ सोनकच्छ में धर्म और साधना का वातावरण बना हुआ है। परम पूज्य पुष्पगिरी तीर्थ प्रणेता गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागरजी महाराज के सानिध्य में व्रत चक्रवर्ती पट्ट विभूषण अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उपाध्याय श्री पियूष सागरजी महाराज ससंघ वर्षायोग के लिए विराजमान हैं। उनके सानिध्य में पर्युषण महापर्व श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जा रहा है।
पर्युषण महापर्व के दूसरे दिन प्रातःकाल उपस्थित गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने उत्तम मार्दव धर्म की व्याख्या करते हुए अहंकार त्यागने का संदेश दिया।
आचार्य श्री ने कहा कि “णमोकार मंत्र का उपासक अहंकार कैसे कर सकता है? क्योंकि जहां णमोकार है, वहां अहंकार नहीं और जहां अहम है, वहां अर्हम् नहीं।”
उन्होंने कहा कि णमोकार और अहंकार दोनों विपरीत धाराएं हैं। णमोकार पूरब है तो अहंकार पश्चिम, णमोकार उत्तर है तो अहंकार दक्षिण। दोनों एक साथ नहीं रह सकते। मनुष्य के जीवन में विनय और नम्रता होगी तो अहंकार स्वतः दूर होता जाएगा।
पांच बार ‘णमो’ का संदेश
आचार्य श्री ने कहा कि णमोकार मंत्र में पांच बार ‘णमो’ शब्द आता है। इसके पीछे गहरा आध्यात्मिक संदेश है। अहंकार मनुष्य के भीतर बहुत जटिल और सूक्ष्म रूप में रहता है। इसलिए बार-बार नमन करने की भावना से अहंकार को चोट पहुंचती है और विनय का विकास होता है।
उन्होंने कहा कि “णमोकार मंत्र की फुहार से अहंकार का हिमालय भी पिघल सकता है। अहंकार का पिघलना, गलना और मिटना ही उत्तम मार्दव धर्म है।”
आचार्य श्री ने अहंकार को मनुष्य के आध्यात्मिक विकास में बड़ी बाधा बताते हुए कहा कि व्यक्ति चाहे कितना भी ज्ञानवान, धनवान या प्रतिष्ठित क्यों न हो, यदि उसके भीतर अहंकार है तो उसकी विनम्रता और आत्मिक सुंदरता अधूरी है। सच्चा बड़प्पन दूसरों के सामने स्वयं को बड़ा साबित करने में नहीं, बल्कि विनम्र बने रहने में है।
अपेक्षाओं से मुक्त रहने का संदेश
आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने कहा कि अहंकार से मुक्ति का सरल उपाय है कि णमोकार मंत्र का अंतःकरण से जाप किया जाए और अपनों से अनावश्यक अपेक्षाएं न रखी जाएं। अपेक्षाएं कम होंगी तो शिकायतें कम होंगी और मन में शांति एवं प्रसन्नता बढ़ेगी।
उन्होंने कहा कि जब मनुष्य नमन करना सीख जाता है, तब उसके चेहरे पर सहजता और चारित्र में निखार दिखाई देने लगता है। विनय व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाती है और अहंकार उसे भीतर से खोखला करता है।
आचार्य श्री के प्रवचन से उपस्थित गुरु भक्तों ने उत्तम मार्दव धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझते हुए आत्मचिंतन और अहंकार त्याग का संकल्प लिया। पूरे परिसर में णमोकार मंत्र के जाप और धार्मिक वातावरण से श्रद्धा की अनुभूति होती रही।







