रायपुर (विश्व परिवार)। कचना स्थित अमलतास कैसल परिसर के 1008 श्री मुनि सुब्रतनाथ दिगंबर जैन मंदिर में चल रहे पर्युषण महापर्व के नवम दिवस पर उत्तम आकिंचन्य धर्म की आराधना श्रद्धा एवं भक्तिभाव के साथ की गई। इस अवसर पर भाई सुरेश मोदी ने अपने उद्बोधन में कहा कि “कुछ भी मेरा नहीं, यही सच्चा आकिंचन्य है।” उन्होंने कहा कि आकिंचन्य धर्म हमें बाहरी वस्तुओं के मोह और परिग्रह से मुक्त होकर अपने आत्मस्वरूप की ओर लौटने का संदेश देता है। धन, संपत्ति, मान-सम्मान और सांसारिक वस्तुओं के प्रति आसक्ति ही मनुष्य को बंधन में रखती है। जब जीवन से ‘मेरा-तेरा’ का भाव कम होता है, तब आत्मा में शांति और सच्चे सुख का अनुभव होने लगता है।
उन्होंने कहा कि दशलक्षण महापर्व आत्मशुद्धि और आत्मचिंतन का अवसर है। हमें इस दौरान अपने भीतर के मोह, ममता और परिग्रह को कम करने का संकल्प लेना चाहिए तथा सरलता, संतोष, संयम और त्याग को जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए। यही उत्तम आकिंचन्य धर्म की वास्तविक भावना है।
महापर्व के नवम दिवस पर प्रातः 7:30 बजे श्रीजी का पाण्डुक शिला पर अभिषेक एवं शांतिधारा संपन्न हुई। इसके पश्चात नित्य पूजन एवं दशलक्षण विधान विधिवत किया गया। सायं 7 बजे भक्तिभाव से संगीतमय आरती हुई। इसके बाद वीरा महिला मंडल के मार्गदर्शन में विभिन्न धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिसमें श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।विदित हो कि दस लक्षण पर्व पर मुनि सुब्रत नाथ परिवार, अमलतास की सबसे वृद्ध सदस्य 93 वर्षीय धर्म निष्ठ सुश्राविका गरिमा पालीवाल ( धर्म सहायिका- स्व. जगदीश चंद जी पालीवाल ) 24 घंटे में केवल एक समय दलिया एवं केवल दो बार जल ग्रहण कर व्रत ( उपवास ) कर स्वयं का कल्याण एवं जिन शासन की शोभा बढ़ा रहीं हैं.







