देशनई दिल्ली

राजनयिक बदलाव के बीच भारत-कनाडा को मजबूत और टिकाऊ रिश्ते बनाने की जरूरत: रिपोर्ट

नई दिल्ली (विश्व परिवार)। एक नई रिपोर्ट के अनुसार, लंबे समय तक राजनयिक रिश्तों में आई खटास के बाद भारत और कनाडा ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा दी है। अब दोनों देश आर्थिक तालमेल और साझा रणनीतिक हितों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। कनाडा की विदेश मंत्री अनीता आनंद और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मंत्री मनिंदर सिद्धू के भारत दौरे तथा डेविड मॉरिसन और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के बीच सुरक्षा संबंधी बातचीत, आपसी भरोसे को फिर से कायम करने की ठोस कोशिश को दर्शाती है। इसका मकसद सिर्फ पुराने रिश्तों को बहाल करना नहीं, बल्कि एक अधिक मजबूत और टिकाऊ साझेदारी का निर्माण करना होना चाहिए।
आर्थिक आधार और सुरक्षा सहयोग पर जोर
‘इंडिया नैरेटिव’ के लेख के अनुसार, मजबूत आर्थिक आधार, भरोसेमंद सुरक्षा सहयोग और ऐसे संस्थागत सुरक्षा उपाय जरूरी हैं, जो 2024 जैसे किसी और राजनयिक संकट को दोबारा होने से रोक सकें। भारत कनाडा को बड़ा और तेजी से बढ़ता बाजार, औद्योगिक क्षमता तथा विकसित होता टेक्नोलॉजी इकोसिस्टम प्रदान करता है। इससे कनाडा को अपने व्यापार और निवेश संबंधों में विविधता लाने तथा अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता कम करने का मौका मिलता है। वहीं कनाडा के पास ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज, कृषि, एयरोस्पेस, आधुनिक तकनीक, शिक्षा और संस्थागत निवेश के क्षेत्र में मजबूत क्षमताएं हैं। कनाडा में भारत के पूर्व उच्चायुक्त संजय कुमार वर्मा के अनुसार, दोनों देशों के पास अपनी सप्लाई चेन में विविधता लाने और आर्थिक मजबूती बढ़ाने के ठोस कारण मौजूद हैं।
राजनीतिक नींव और हालिया प्रगति
इस नए दौर की राजनीतिक नींव 2025 के जी-7 शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के बीच हुई बातचीत से रखी गई थी। इसके बाद 27 फरवरी से 2 मार्च 2026 तक कार्नी ने भारत का दौरा किया। दोनों नेताओं ने भारत-कनाडा सीईओ फोरम को फिर से शुरू करने, वित्त मंत्रियों के बीच आर्थिक और वित्तीय संवाद, सुरक्षा सहयोग मजबूत करने तथा व्यापार-निवेश पर नियमित बातचीत को बढ़ावा देने का समर्थन किया। इन तंत्रों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि राजनीतिक मतभेद होने पर भी सहयोग बना रहे। 13 अक्टूबर को फोन पर हुई बातचीत में पीएम मोदी और कार्नी ने जल्द से जल्द व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते (सीईपीए) को पूरा करने की प्रतिबद्धता दोहराई। दिसंबर में प्रधानमंत्री मोदी का प्रस्तावित कनाडा दौरा रिश्तों में आए इस बदलाव के ठोस परिणाम दिखाने का एक और मौका हो सकता है। राजनीतिक ढांचा तैयार है; अब इसे किस तरह लागू किया जाता है, उसी से इसकी विश्वसनीयता तय होगी।
अर्ली-वॉरनिंग मैकेनिज्म की जरूरत
लेख में जोर दिया गया है कि 2024 के अनुभव से एक व्यवस्थित ‘अर्ली-वॉरनिंग मैकेनिज्म’ (शुरुआती चेतावनी प्रणाली) की जरूरत साफ हो गई है। इसके तहत तय वरिष्ठ अधिकारियों को उभरती चिंताओं की तुरंत जानकारी देनी चाहिए, उनके प्रभावों का आकलन करना चाहिए और जो मुद्दे हल न हो सकें, उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों या विदेश मंत्रियों के पास भेजना चाहिए। नियमित समीक्षा और जानकारी साझा करने की तय प्रक्रियाएं गलतफहमियों को बड़े राजनयिक संकट में बदलने से रोकने में मदद करेंगी। ऐसी व्यवस्था से मतभेद पूरी तरह खत्म तो नहीं होंगे, लेकिन इससे यह सुनिश्चित होगा कि इनकी वजह से साझेदारी बार-बार पटरी से न उतरे।
खालिस्तानी चरमपंथ को लेकर चिंता
भारत के लिए कनाडा की धरती से काम कर रहे खालिस्तान-समर्थक चरमपंथी संगठनों की गतिविधियां लंबे समय से चिंता का विषय रही हैं। जायज चिंता यह है कि क्या कनाडा की जमीन का इस्तेमाल भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के खिलाफ डराने-धमकाने, हिंसा या अन्य गैर-कानूनी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए किया जा रहा है। लेखक का मानना है कि पिछले कुछ समय से खालिस्तानी चरमपंथी न केवल भारत के लिए, बल्कि कनाडा की अपनी सुरक्षा और जीवनशैली के लिए भी खतरा बन गए हैं। कनाडाई सुरक्षा खुफिया सेवा (सीएसआईएस) ने अपनी 2025 पब्लिक रिपोर्ट में कहा है कि कनाडा में मौजूद खालिस्तानी चरमपंथियों का हिंसक गतिविधियों में लगातार शामिल रहना कनाडा और उसके हितों के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा खतरा है। कुल मिलाकर, रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि दोनों देशों को अब सिर्फ रिश्तों को सुधारने से आगे बढ़कर एक स्थायी, भरोसेमंद और संकट-रोधी साझेदारी बनाने पर काम करना चाहिए।

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