धर्म

“स्वयं को जानो, जागो, ध्याओ और पाओ — यही साधना की पूर्ण यात्रा : मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज

गिरीडीह (विश्व परिवार) श्री सम्मेदशिखर तीर्थ पर आयोजित प्रातःकालीन धर्मसभा में गुणायतन प्रणेता मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि धर्म के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि “मैं कौन हूँ? मेरी वास्तविक पहचान क्या है?” जब व्यक्ति अपने भीतर झांकता है और अपने भावों को पढ़ता है, तब वह अपने दोषों और गुणों को समझता है, तभी साधना का मार्ग खुलता है।
मुनि श्री ने कहा कि जब तक हम अपने आपको नहीं जानेंगे, तब तक अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं पहचान सकते। हम धर्म के क्षेत्र में पूजा, पाठ, जप, तप, व्रत आदि बहुत करते हैं, पर यदि इन सबके बीच स्वयं को ही न पहचाना, तो यह साधना अधूरी रह जाती है। साधना की दिशा में सबसे पहले अपने आपको जानना आवश्यक है। जानने के पश्चात — जानो, जागो, ध्याओ और पाओ — ये चार शब्द जीवन को परिवर्तित कर देते हैं।
उन्होंने कहा कि सबसे पहले अपने स्वरूप को समझो — “मैं केवल शरीर नहीं, एक चेतन आत्मा हूँ।” फिर अज्ञान और प्रमाद से जागो, अपने भीतर की सजगता को जगाओ। इसके बाद अपने शुद्ध स्वरूप का चिंतन-मनन करो और उसी में स्थिर होने का अभ्यास करो। तब आत्मिक शांति और कुशलता की प्राप्ति होती है। उन्होंने कहा, “साधना बाहर की दौड़ नहीं, भीतर की यात्रा है। स्वयं को स्वयं में जागना उसका मध्य है और स्वयं को पा लेना उसकी पूर्णता है।”
मुनि श्री ने चेतना की चार अवस्थाओं का वर्णन करते हुए कहा कि पहली सुषुप्त अवस्था है, जिसमें व्यक्ति अज्ञान में रहता है। दूसरी स्वप्न अवस्था है, जिसमें मन कल्पनाओं का संसार बना लेता है। तीसरी जागृत अवस्था है, जिसमें व्यक्ति बाहरी रूप से जागा होता है, पर भीतर मोह और मान्यताओं में बंधा रहता है। चौथी प्रबुद्ध अवस्था है, जो वास्तविक जागरण है। इसमें व्यक्ति अपने स्वरूप को पहचान लेता है और साक्षीभाव में स्थित हो जाता है।
उन्होंने कहा कि सपना कभी अपना नहीं होता। स्वप्नावस्था में व्यक्ति “मेरा-मेरा” में सुख मानता है, पर जागने पर समझ आता है कि सब अस्थायी है। तब साधक अनुभव करता है कि “मैं मालिक नहीं, केवल संरक्षक हूँ। वस्तुएँ मेरे पास हैं, पर मेरी नहीं हैं।” जागना शुरुआत है, पर उससे ऊपर उठना ही सच्ची मुक्ति है।
मुनि श्री ने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे कोई खंभे को पकड़कर कहे कि खंभे ने मुझे पकड़ लिया, जबकि वास्तव में हमने ही खंभे को पकड़ा है। मनुष्य जागृत तो हो जाता है, पर प्रलोभन से मुक्त नहीं होता। जो जागृत होकर वैराग्य के मार्ग पर निकल पड़ता है, उसकी चेतना प्रलोभन से ऊपर उठने लगती है।
उन्होंने कहा कि जब मनुष्य समझ लेता है कि संसार का सुख क्षणिक है, तभी वह भीतर की शांति की ओर मुड़ता है। चक्रवर्ती राजाओं ने राजपाट त्यागा, दीक्षा ली और तपस्या की, क्योंकि उन्होंने समझ लिया कि संसार माया का जाल है और स्थायी सुख इसमें नहीं है। इसलिए उन्होंने आत्मकल्याण के मार्ग को अपनाया।
गुणायतन के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि इस अवसर पर मुनि श्री संधान सागर महाराज, मुनि श्री सार सागर, मुनि श्री समादर सागर तथा मुनि श्री रूप सागर पंच ऋषिराज गुणायतन में विराजमान हैं। ग्रीष्मकाल की तपन प्रारंभ हो चुकी है। प्रातः 7 बजे से अभिषेक एवं शांतिधारा, तत्पश्चात मुनि श्री के प्रवचन तथा 9 बजे से आहारचर्या संपन्न हो रही है।

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