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कोचरब आश्रम: जहाँ बैरिस्टर मोहनदास से ‘महात्मा’ बनने की शुरू हुई यात्रा

  • सत्याग्रह, सामाजिक समरसता और आत्मानुशासन की पहली प्रयोगशाला आज भी सहेजे हुए है गांधी के विचारों की विरासत

अहमदाबाद (विश्व परिवार)। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास जब भी लिखा जाएगा, उसमें साबरमती आश्रम का उल्लेख अवश्य होगा, लेकिन उससे पहले एक ऐसा आश्रम था जिसने महात्मा गांधी के विचारों, सत्याग्रह और सामुदायिक जीवन की नींव रखी। अहमदाबाद के पालडी क्षेत्र स्थित कोचरब आश्रम वह स्थान है, जहाँ दक्षिण अफ्रीका से लौटे मोहनदास करमचंद गांधी ने पहली बार अपने विचारों को व्यवहार में उतारा और यहीं से एक बैरिस्टर के ‘महात्मा’ बनने की ऐतिहासिक यात्रा प्रारंभ हुई।
पत्र सूचना कार्यालय, रायपुर द्वारा आयोजित पत्रकारों के अध्ययन भ्रमण के दौरान कोचरब आश्रम के प्रबंधक डॉ. प्रसन्ना गांधी ने बताया कि वर्ष 1915 में स्थापित यह आश्रम केवल एक निवास नहीं था, बल्कि सत्याग्रह, आत्मशुद्धि, सामुदायिक जीवन और सामाजिक सुधारों की पहली प्रयोगशाला था। उन्होंने कहा कि दक्षिण अफ्रीका के फीनिक्स सेटलमेंट और टॉल्स्टॉय फार्म में प्राप्त अनुभवों को गांधीजी ने पहली बार भारत की धरती पर कोचरब आश्रम में साकार किया।
गोखले की सलाह के बाद चुना अहमदाबाद
9 जनवरी 1915 को दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने के बाद गांधीजी ने अपने राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले की सलाह पर देश का व्यापक भ्रमण किया। आश्रम स्थापना के लिए उन्होंने कई स्थानों पर विचार किया, लेकिन अंततः अहमदाबाद का चयन किया। इसके पीछे प्रमुख कारण थे कि यह उनकी मातृभाषा गुजराती का प्रमुख केंद्र था, वस्त्र उद्योग का महत्वपूर्ण नगर था और यहां के उद्योगपतियों एवं व्यापारियों से राष्ट्रीय आंदोलन के लिए सहयोग मिलने की संभावना थी।
150 वर्ष पुराने बंगले से शुरू हुई सत्याग्रह की प्रयोगशाला
कोचरब आश्रम की शुरुआत गांधीजी के मित्र एवं बैरिस्टर जीवनलाल देसाई के लगभग 150 वर्ष पुराने बंगले से हुई। भवन की निचली मंजिल पर आश्रमवासियों का निवास था, जबकि ऊपरी मंजिल पर बैठकें आयोजित होती थीं। यहीं स्वतंत्रता आंदोलन की प्रारंभिक रणनीतियों पर चर्चा होती थी। आज भी यह कक्ष ‘सत्याग्रह मेमोरियल हॉल’ के रूप में संरक्षित है, जहाँ मूल लकड़ी का फर्श सुरक्षित रखा गया है।
वैज्ञानिक तरीके से संरक्षित की गई ऐतिहासिक धरोहर
हाल के वर्षों में गुजरात सरकार ने आश्रम का संरक्षण एवं पुनर्विकास कराया। वर्ष 2022-23 में भवन की वैज्ञानिक तकनीकों से मरम्मत की गई। मूल लकड़ी, खिड़कियों, छत और दीवारों को यथासंभव सुरक्षित रखते हुए भवन को संरचनात्मक मजबूती प्रदान की गई। परिसर में आधुनिक संग्रहालय, प्रदर्शनी दीर्घाएं तथा गतिविधि केंद्र विकसित किए गए हैं, जहाँ गांधीजी के जीवन, विचारों और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े प्रसंगों को आधुनिक तकनीक के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है।
यहीं शुरू हुई अस्पृश्यता के विरुद्ध सबसे बड़ी सामाजिक लड़ाई
कोचरब आश्रम भारतीय समाज सुधार के इतिहास में भी विशेष महत्व रखता है। आश्रम की स्थापना के कुछ समय बाद गांधीजी ने एक दलित परिवार—दूधाभाई, दानीबेन और उनकी पुत्री लक्ष्मी—को आश्रम में रहने की अनुमति दी। इस निर्णय का आश्रम के कुछ सदस्यों और तत्कालीन समाज के प्रभावशाली वर्ग ने विरोध किया। आर्थिक सहायता भी बंद कर दी गई, जिससे आश्रम के समक्ष गंभीर आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया।
गांधीजी अपने निर्णय पर अडिग रहे। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि आर्थिक सहायता बंद करनी है तो कर दी जाए, लेकिन समानता और मानवता के सिद्धांतों से समझौता नहीं होगा। इसी कठिन समय में उद्योगपति अंबालाल साराभाई ने आर्थिक सहयोग देकर आश्रम को संकट से उबारा।
कस्तूरबा थीं गांधीजी की सबसे बड़ी सहयोगी
डॉ. प्रसन्ना गांधी के अनुसार, आश्रम के अनेक महत्वपूर्ण निर्णयों में कस्तूरबा गांधी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी। गांधीजी कई विषयों पर उनकी सलाह लेते थे और सामुदायिक जीवन के संचालन में उनके सुझावों का सम्मान करते थे। आश्रम में महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग आवास तथा सामूहिक रसोई की व्यवस्था थी।
यहीं बने गांधीजी के 11 जीवन-व्रत
कोचरब आश्रम में गांधीजी ने आत्मशुद्धि और समाज निर्माण के लिए 11 व्रतों की व्यवस्था विकसित की। इनमें सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्तेय, अपरिग्रह, अस्वाद, शारीरिक श्रम, स्वदेशी, अभय, अस्पृश्यता निवारण और सर्वधर्म समभाव प्रमुख हैं। उनका मानना था कि व्यक्ति के चरित्र निर्माण से ही समाज और राष्ट्र का निर्माण संभव है।
प्लेग के कारण साबरमती आश्रम में हुआ स्थानांतरण
वर्ष 1917 में कोचरब क्षेत्र में प्लेग फैलने के बाद गांधीजी ने आश्रम को साबरमती नदी के किनारे स्थानांतरित करने का निर्णय लिया। उनका विचार था कि आश्रम ऐसे स्थान पर होना चाहिए जहाँ एक ओर जेल और दूसरी ओर श्मशान हो, ताकि सत्याग्रही हर परिस्थिति के लिए मानसिक रूप से तैयार रहे। यही विचार आगे चलकर साबरमती आश्रम की स्थापना का आधार बना।
विचारों की विरासत से परिचित कराता संग्रहालय
आश्रम में आज भी गांधीजी के आध्यात्मिक गुरु श्रीमद राजचंद्र, राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले तथा उनके प्रेरणास्रोत लियो टॉल्स्टॉय, जॉन रस्किन और हेनरी डेविड थोरो के चित्र एवं विचार प्रदर्शित किए गए हैं। दक्षिण अफ्रीका के फीनिक्स सेटलमेंट और टॉल्स्टॉय फार्म से जुड़ी जानकारी भी संग्रहालय का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
आधुनिक स्वरूप, लेकिन मूल भावना बरकरार रखने की चुनौती
पुनर्विकास के बाद कोचरब आश्रम आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित हो गया है। संग्रहालय, गतिविधि केंद्र और आगंतुक सुविधाओं के माध्यम से नई पीढ़ी को गांधीजी के विचारों से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि हाल के दिनों में आश्रम परिसर में आयोजित एक सामाजिक समारोह को लेकर उठे विवाद ने यह प्रश्न भी खड़ा किया कि आधुनिक उपयोग और गांधीवादी सादगी के बीच संतुलन कैसे बनाए रखा जाए।
आज भी उतना ही प्रासंगिक है कोचरब आश्रम
कोचरब आश्रम केवल एक ऐतिहासिक इमारत नहीं, बल्कि भारत के सामाजिक पुनर्जागरण, सत्याग्रह और नैतिक नेतृत्व का जीवंत प्रतीक है। यदि साबरमती आश्रम ने स्वतंत्रता आंदोलन को राष्ट्रीय स्वरूप दिया, तो उसकी वैचारिक और नैतिक नींव कोचरब आश्रम में रखी गई थी। यही कारण है कि आज भी यह आश्रम इतिहास के विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं, पत्रकारों और देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों के लिए प्रेरणा का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।

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