कुण्डलपुर (विश्व परिवार)। निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने कहा कि दान और भक्ति मनुष्य के जीवन को स्वर्णिम बनाते हैं। दान से हृदय में उदारता का विकास होता है और भक्ति से आत्मा निर्मल बनती है। जब दान, भक्ति और सम्यक आचरण का समन्वय होता है, तब मनुष्य का जीवन धर्ममय बनकर सिद्धत्व की दिशा में अग्रसर होता है। सिद्धत्व ही प्रत्येक आत्मा का अंतिम और सर्वोच्च लक्ष्य है। धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए मुनि श्री ने णमोकार महामंत्र के पाँच पदों का आध्यात्मिक रहस्य समझाया। उन्होंने कहा कि णमोकार महामंत्र किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि गुणों का वंदन है। इसके पाँचों पद साधक को आत्मोन्नति और मोक्षमार्ग की ओर प्रेरित करते हैं।
मुनि श्री ने कहा कि अरिहंत वे हैं जिन्होंने अपने भीतर के समस्त राग-द्वेष और कषायों को जीत लिया है। उनका जीवन हमें आत्मविजय का संदेश देता है। सिद्ध परमेष्ठी वे हैं जिन्होंने जन्म-मरण के चक्र से पूर्ण मुक्ति प्राप्त कर ली है। सिद्ध अवस्था आत्मा की परम और शाश्वत अवस्था है, जहाँ अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख और अनंत वीर्य का वास होता है। प्रत्येक जीव का वास्तविक लक्ष्य इसी सिद्ध पद की प्राप्ति होना चाहिए।
उन्होंने आगे कहा कि आचार्य परमेष्ठी धर्मसंघ के मार्गदर्शक होते हैं। उनका जीवन अनुशासन, संयम और आदर्श नेतृत्व का प्रतीक है। उपाध्याय परमेष्ठी शास्त्रज्ञान के माध्यम से समाज को धर्म का प्रकाश प्रदान करते हैं, जबकि साधु परमेष्ठी तप, त्याग, संयम और साधना का सजीव उदाहरण होते हैं। इन पाँचों परमेष्ठियों के गुणों का स्मरण और वंदन करने से आत्मा में पवित्रता का संचार होता है।
मुनि श्री ने कहा कि केवल पूजा-अर्चना कर लेना ही पर्याप्त नहीं है। सच्ची भक्ति वही है जो जीवन में विनम्रता, करुणा, क्षमा, संयम और सेवा के संस्कार उत्पन्न करे। भक्ति यदि व्यवहार में परिवर्तन नहीं लाती, तो वह केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है। धर्म का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य के अंतर्मन को बदलना और आत्मा को उसके शुद्ध स्वरूप की ओर ले जाना है।
उन्होंने दान की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि दान केवल धन का नहीं, बल्कि समय, ज्ञान, सेवा और सद्भाव का भी होना चाहिए। निष्काम भाव से किया गया दान अनेक जन्मों तक पुण्य का कारण बनता है। दान से अहंकार घटता है, परोपकार की भावना बढ़ती है और समाज में समरसता का वातावरण निर्मित होता है।
मुनि श्री ने कहा कि वर्तमान समय में मनुष्य भौतिक उपलब्धियों के पीछे दौड़ते हुए आत्मकल्याण को भूलता जा रहा है। धन, पद और प्रतिष्ठा जीवन के साधन हो सकते हैं, साध्य नहीं। यदि जीवन में भक्ति, संयम और आत्मचिंतन का समावेश नहीं होगा, तो बाहरी सफलता भी स्थायी सुख नहीं दे सकेगी। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन कुछ समय आत्ममंथन, स्वाध्याय और प्रभु भक्ति के लिए अवश्य निकालना चाहिए।
उन्होंने कहा कि णमोकार महामंत्र का नियमित जाप मन को स्थिर, शांत और सकारात्मक बनाता है। यह मंत्र किसी से कुछ माँगने का मंत्र नहीं, बल्कि अपने भीतर श्रेष्ठ गुणों को जागृत करने का महामंत्र है। जब मनुष्य इन गुणों को अपने जीवन में उतारता है, तभी उसका जीवन वास्तव में सफल और सार्थक बनता है। प्रचारमंत्री जयकुमार जैन जलज एवं अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि
धर्मसभा के अंत में मुनि श्री ने सभी श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि वे अपने जीवन में दान, भक्ति, संयम और सदाचार को अपनाकर आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ें। यही मानव जीवन की सार्थकता है और यही आत्मा को सिद्धत्व की ओर ले जाने वाला सच्चा मार्ग है। इस अवसर पर प्रथम अभिषेक, शांतिधारा रिद्धिकलश आदि करने का सौभाग्य ब्र. संगीता दीदी हेमलता अंगूरी देवी परिवार ईसागढ़ -गुना, रुचि अनंत संदीप परिवार मुजफ्फरनगर, दिनेश मंजू सनी परिवार इंदौर, वीरेंद्र तरुण जगाधरी हरियाणा, उमेश अंकित अशोक नगर, निश्चल जैन गाजियाबाद, प्रदीप रेखा परिवार ईसागढ़, विनोद आदिश जबलपुर, अरुण मनीषा परिवार नरसिंहपुर, अशोक जैन भिंड, अभिषेक भोपाल, ध्रुव पवन जैन भिंड, महेंद्र जैन बेगमगंज आदि के साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु भक्तों ने पूज्य बड़े बाबा के चरणाभिषेक का सौभाग्य प्राप्त किया। पूज्य ऐलक अपारसागर जी, क्षुल्लक भास्वतसागर जी महाराज ने केशलोंच किया।







