रायपुर (विश्व परिवार)। शहरी भारत में एक गंभीर लेकिन “साइलेंट” स्वास्थ्य समस्या तेजी से बढ़ रही है। अनुमान के अनुसार, लगभग हर तीन में से एक शहरी भारतीय फैटी लिवर बीमारी से प्रभावित हो सकता है, वह भी बिना किसी स्पष्ट लक्षण के। विश्व लिवर दिवस के अवसर पर रामकृष्ण केयर हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि जो बीमारी पहले अधिकतर बुजुर्गों में देखी जाती थी, अब वह 30–50 वर्ष आयु वर्ग में तेजी से सामने आ रही है।
“यह केवल एक मेडिकल समस्या नहीं है, बल्कि बदलती जीवनशैली का परिणाम है। लंबे समय तक बैठकर काम करना, अनियमित खानपान, फास्ट फूड का सेवन, बढ़ता तनाव और शारीरिक गतिविधि की कमी—ये सभी लिवर स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहे हैं। खासतौर पर आईटी और कॉर्पोरेट प्रोफेशनल्स में इसके मामले ज्यादा देखे जा रहे हैं, और डायबिटीज, मोटापा व हाई ब्लड प्रेशर वाले लोगों में जोखिम अधिक है,”
-डॉ. संदीप पांडे, सीनियर गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट एवं विभागाध्यक्ष, गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी, रामकृष्ण केयर हॉस्पिटल।
लिवर बीमारी की सबसे बड़ी चिंता इसकी “साइलेंट” प्रकृति है। शुरुआती चरण में कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखते और अक्सर यह बीमारी रूटीन जांच के दौरान ही सामने आती है। कई मरीज मामूली शिकायत लेकर आते हैं और जांच में गंभीर लिवर समस्या सामने आती है। वहीं कुछ लोग तब इलाज के लिए आते हैं जब बीमारी सिरोसिस या लिवर फेलियर तक पहुंच चुकी होती है, जिससे इलाज जटिल और महंगा हो जाता है,
-डॉ. ललित निहाल, सीनियर कंसल्टेंट हेपेटोलॉजिस्ट।
“लिवर की बीमारियां अक्सर बिना लक्षण के बढ़ती हैं और एडवांस स्टेज में ही सामने आती हैं। इसलिए समय रहते जांच कराना बेहद जरूरी है। केवल लिवर फंक्शन टेस्ट पर्याप्त नहीं है। लोगों को व्यापक जांच करवानी चाहिए, जिसमें ब्लड टेस्ट, अल्ट्रासाउंड और जरूरत पड़ने पर फाइब्रोस्कैन शामिल है, जो लिवर में फैट और कठोरता का आकलन करता है। समय पर पहचान और उपचार से बेहतर परिणाम मिल सकते हैं, जबकि देरी गंभीर जटिलताओं और यहां तक कि लिवर ट्रांसप्लांट की जरूरत तक ले जा सकती है।”
-डॉ. हितेश दुबे, कंसल्टेंट हेपेटोबिलियरी एवं लिवर ट्रांसप्लांट सर्जन।
इस चुनौती से निपटने के लिए रामकृष्णा केयर हॉस्पिटल्स ने गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी, हेपेटोलॉजी, क्रिटिकल केयर और ट्रांसप्लांट सेवाओं को जोड़ते हुए मल्टीडिसिप्लिनरी अप्रोच अपनाई है, जिससे समय रहते पहचान और उपचार संभव हो सके।
डॉक्टरों का सुझाव है कि 30 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को, विशेष रूप से जिनकी जीवनशैली बैठकर काम करने वाली है या जिन्हें डायबिटीज है, उन्हें हर साल लिवर की जांच करवानी चाहिए। थकान, भूख कम लगना, वजन बढ़ना और पेट के आसपास चर्बी बढ़ना जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। साथ ही, बिना डॉक्टर की सलाह के दवाइयों और सप्लीमेंट्स के सेवन से बचने की भी सलाह दी गई है।
विश्व लिवर दिवस पर रामकृष्णा केयर हॉस्पिटल्स का स्पष्ट संदेश है—
“लिवर की बीमारी भले ही साइलेंट हो, लेकिन इसे नजरअंदाज करना जानलेवा साबित हो सकता है। समय पर जांच ही सबसे बेहतर बचाव है।”




