अंबिकापुर (विश्व परिवार)। बहुचर्चित रिंगबांध जमीन फर्जीवाड़े में मुख्य आरोपी आजाद इराकी को जमानत दिए जाने के विरोध में सरगुजा कलेक्टर आईएएस अजीत बसंत द्वारा प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश को लिखा गया पत्र चर्चा का विषय बन गया है। कलेक्टर ने पत्र में बिना सरकारी पक्ष को सुने ही आरोपी को जमानत देने पर आपत्ति जताई है।
दरअसल, अंबिकापुर के रिंगबांध इलाके में आदिवासियों की बहुमूल्य जमीनों की अवैध रूप से रजिस्ट्री कराई गई। इसमें फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र और फर्जी दस्तावेज तैयार कर जिंदा इंसानों को कागजों पर मुर्दा बताकर या मृतकों के फर्जी वारिस खड़े करके आदिवासियों की बेशकीमती जमीन हड़प ली गई। पुलिस ने इस पूरे फर्जीवाड़े के मुख्य सूत्रधार आजाद इराकी पर शिकंजा कसा था। लेकिन आगे इस पर कोई ठोस कार्रवाई पुलिस कर पाती, इसके पहले ही कोर्ट से आजाद इराकी को जमानत मिल गई।
कलेक्टर अजीत वसंत का कहना है कि निचली अदालत ने जमानत देते समय न्यायालयीन क्षेत्राधिकार का ध्यान नहीं रखा और बिना अभियोजन पक्ष (सरकारी पक्ष) की दलीलें सुनते ही आरोपी को राहत दे दी। कलेक्टर का मानना है कि इतने बड़े आदिवासी जमीन घोटाले में आरोपी का बाहर आना सबूतों के साथ छेड़छाड़ का कारण बन सकता है, इसलिए उन्होंने सीधे जिला जज को पत्र लिखकर अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि किसी न्यायिक आदेश के खिलाफ प्रशासनीय पत्र लिखना एक बेहद असामान्य है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या एक कलेक्टर के पास यह अधिकार है कि वह अदालत के किसी फैसले पर उंगली उठा सके? क्या कलेक्टर के पास न्यायिक शक्तियां होती हैं? सीधे जज को पत्र लिखना कितना जायज? सामान्य तौर पर, किसी भी न्यायिक आदेश को चुनौती देने के लिए केवल न्यायिक प्रक्रिया का ही इस्तेमाल किया जाता है, पत्राचार का नहीं।








