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एनआईटी रायपुर में भारतीय ज्ञान प्रणाली अध्ययन मंडल द्वारा “भारत की ज्ञान परंपरा में वास्तुकला, इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी” विषय पर व्याख्यान सत्र का किया गया आयोजन

रायपुर (विश्व परिवार)। राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) रायपुर में भारतीय ज्ञान प्रणाली (आईकेएस) अध्ययन मंडल द्वारा 27 जनवरी 2026 को व्याख्यान-चर्चा सत्र का सफल आयोजन किया गया। इस सत्र का उद्देश्य भारत की ज्ञान परंपरा में निहित वास्तुकला, इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी के मूल सिद्धांतों को समझना तथा उनकी आधुनिक संदर्भों में प्रासंगिकता पर प्रकाश डालना था। सत्र के मुख्य अतिथि व वक्ता अध्यक्ष, छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी, श्री शशांक शर्मा रहे | इस दौरान निदेशक, एनआईटी रायपुर, डॉ. एन. वी. रमना राव, चिंतक तथा पत्रकार, श्री संजय तिवारी, फैकल्टी मेंबर्स, और विद्यार्थी मौजूद रहे | इस कार्यक्रम का आयोजन डॉ. तोषन मीनपाल, अध्यक्ष, भारतीय ज्ञान प्रणाली (आईकेएस) केंद्र, एनआईटी रायपुर, तथा डॉ. चन्दन कुमार सिंह, समन्वयक, आईकेएस अध्ययन मंडल, एनआईटी रायपुर द्वारा किया गया।
कार्यक्रम की शुरुआत वंदे मातरम् से की गई। इसके पश्चात डॉ. राव ने अपने उद्बोधन में भारतीय ज्ञान परंपरा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारतीय दर्शन जीवन के सभी पहलुओं को संतुलित और समग्र दृष्टि प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि भारतीय दार्शनिक मूल्य नैतिक और सामाजिक जीवन को दिशा देते हैं। श्री संजय तिवारी ने अपने संबोधन में देशभक्ति गीत के माध्यम से भारतीय संस्कृति की गहराई को रेखांकित करते हुए कहा कि शून्य का ज्ञान देने वाला भारत वही राष्ट्र है, जिसके विचारों के पीछे पूरा विश्व चला। संजय तिवारी ने कहा कि भारत में कुछ विशेष था, इसी कारण विदेशी शक्तियाँ यहाँ आकर्षित हुईं, और इसलिए हमें अपनी विरासत पर गर्व करना चाहिए।
मुख्य वक्ता श्री शशांक शर्मा ने अपने संबोधन में भारतीय इतिहास, उपनिषदों तथा ज्ञान परंपरा के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारत में सहस्रों वर्षों तक विदेशी शासन का गुलाम रहा , जिससे हमारी प्राचीन ज्ञान और सभ्यता विलुप्ति के कगार पर आ गई। उन्होंने उदाहरण के रूप में अरस्तू और बेंजामिन फ्रैंकलिन का उल्लेख किया। शशांक शर्मा ने युवाओं से कहा कि उन्हें भारतीय ज्ञान परंपरा, प्राचीन ग्रंथों और सांस्कृतिक विरासत का अध्ययन करना चाहिए, ताकि वे इसकी गहराई और महत्व को समझ सकें और आने वाले समय में 2047 तक आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाएँ। उन्होंने राइट ब्रदर्स के विमान निर्माण की अवधारणा के बारे में बात करते हुए कहा कि विमान निर्माण राईट ब्रदर्स के पहले श्री शिवाजी भाऊ तलपडे और उनके भाई द्वारा किया गया था, क्युकी हमारे बहुत से शाश्त्रों में विमान निर्माण से समबन्धित साक्ष्य मिलते है , जिनका प्रयोग कर तलपडे बंधुओं से सबसे पहले विमान उड़ाया था |
उन्होंने ने औपनिवेशिक मानसिकता पर चर्चा करते हुए कहा कि भारत हजार वर्षों की गुलामी से बाहर निकल चुका है, लेकिन मानसिक गुलामी अभी भी एक बड़ी चुनौती है। उन्होंने यूरोपीय शिक्षा प्रणाली, 1854 की शिक्षा नीति और भारतीय ज्ञान को विकृत रूप में प्रस्तुत किए जाने की आलोचना की। हिंद स्वराज सहित कई पुस्तकों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय सभ्यता को समझे बिना उसे यूरोपीय दृष्टि से परखना अनुचित है। उन्होंने आर्य समाज, स्वामी दयानंद सरस्वती और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सांस्कृतिक पुनर्जागरण की भूमिका को भी रेखांकित किया। अपने व्याख्यान में उन्होंने भारतीय स्थापत्य, विज्ञान और तकनीकी ज्ञान के उदाहरण देते हुए कोणार्क सूर्य मंदिर, तंजावुर मंदिर, कैलाश मंदिर एलोरा, रानी की वाव और प्राचीन मंदिरों की वास्तुकला, वायु संचार व्यवस्था तथा भूकंपरोधी संरचनाओं का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अथर्ववेद, भारद्वाज मुनि और प्राचीन ग्रंथों में विमान, गणित, खगोल और यंत्र विज्ञान के उल्लेख मिलते हैं, जिनसे आधुनिक विज्ञान ने प्रेरणा ली। उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे भारतीय ज्ञान परंपरा को अपनाएँ, नई शोध दिशाएँ खोजें और विकसित भारत के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाएँ।
इसके बाद फीडबैक सत्र , स्मृति चिन्ह वितरण और डॉ. चन्दन सिंह द्वारा धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया गया | अंत में राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम का सफलतापूर्वक समापन किया गया।

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