गौरेला (विश्व परिवार)। संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के सुयोग्य शिष्य निर्यापक श्रमण श्री प्रसाद सागर महाराज ने कहा कि अमरकंटक पर्वत से उद्गमित नर्मदा नदी सूदूर यात्रा कर खंभात की खाड़ी में सागर से जा मिलती है। नदी दोनों तटों के बीच बहकर लक्ष्य को पा जाती है। सरिता के दोनों तट संयम रूपी सीमा की भांति हैं।
नदी अगर संयम के तट के बीच बहती है,तभी यात्रा सफल होती है।तट टूट जाये तो लक्ष्य छूट जाता है। यात्रा की सफलता संयम में ही निहित है। आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के शिष्यों मुनि श्री प्रसाद सागर जी महाराज और मुनि श्री शीतल सागर जी महाराज के गौरेला नगर आगमन पर जैन समाज गौरेला ने नगर की सीमा पर उत्साह पूर्वक अगवानी की।
नगर आगमन के उपरांत जैन धर्मावलंबियों को संबोधित करते हुए निर्यापक श्रमण श्री प्रसाद सागर महाराज ने आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के कथन का स्मरण करते कहा कि अमरकंटक के संबंध में उन्होंने कहा था कि यहां ध्यान लगाने की आवश्यकता नहीं होती ध्यान स्वयं ही लग जाता है। गिर से गिरती हुई सरिता सागर में समा जाती है। नदी की निम्नगा कहते हैं, नम्रता और विनय युक्त आचरण आपकी सफलता सुनिश्चित करते हैं।
आपने कहा कि ताला जिस चाबी से लगता है उसी चाबी से ताला खुलता भी है। ऐसा ही ज्ञान है ज्ञान यदि राग मोह के साथ हो तो प्रतिकूल परिणाम देता है और यदि समता के साथ हो तो अनुकूल परिणाम देता है। ज्ञान का उपयोग स्वपरकल्याण के लिये किया जाना चाहिए।
मुनि द्वय के नगर आगमन से प्रफुल्लित गौरेला पेण्ड्रा की जैन समाज ने मुनि महाराजों से निवेदन करते हुए गौरेला पेण्ड्रा नगर में पावस योग चातुर्मास का अनुरोध किया।








