देवघर (विश्व परिवार)। झारखंड की आध्यात्मिक राजधानी के रूप में प्रसिद्ध देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह एकमात्र ऐसा प्रमुख तीर्थस्थल माना जाता है, जहां भगवान शिव का ज्योतिर्लिंग और माता सती का शक्तिपीठ एक ही परिसर में स्थित हैं। ‘मनोकामना लिंग’ के रूप में विख्यात बाबा बैद्यनाथ धाम हर वर्ष करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनता है, जबकि सावन में लगने वाला विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेला इसकी आध्यात्मिक पहचान को और अधिक व्यापक बनाता है।
ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ का अद्वितीय संगम
देवघर को बैद्यनाथ धाम और बाबाधाम के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह देश का ऐसा पवित्र स्थल है जहां भगवान शिव का ज्योतिर्लिंग और माता सती का हृदय पीठ (शक्तिपीठ) साथ-साथ स्थित हैं। मुख्य मंदिर परिसर में भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग के सामने माता पार्वती का मंदिर है। दोनों मंदिरों के शिखरों को लाल रेशमी धागे से बांधने की परंपरा शिव और शक्ति के अविभाज्य संबंध का प्रतीक मानी जाती है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस परंपरा के साक्षी बनने या इसमें सहभागी होने से वैवाहिक जीवन सुखमय और अटूट बना रहता है।
22 मंदिरों वाला भव्य मंदिर परिसर
बाबा बैद्यनाथ धाम का मुख्य मंदिर अपनी स्थापत्य कला और आध्यात्मिक ऊर्जा के लिए प्रसिद्ध है। 72 फीट ऊंचे मुख्य शिखर को कमल के आकार में तराशे गए पत्थरों से बनाया गया है। मुख्य परिसर में कुल 22 मंदिर हैं, जो माता पार्वती, भगवान गणेश, हनुमान जी, काल भैरव, मां सरस्वती सहित विभिन्न देवी-देवताओं को समर्पित हैं।
पंचशूल बनाता है मंदिर को विशिष्ट
बाबा बैद्यनाथ धाम की एक और विशेषता मंदिर के शिखर पर स्थापित पंचशूल है। अधिकांश शिव मंदिरों में जहां त्रिशूल स्थापित होता है, वहीं यहां पांच तीरों वाला पंचशूल लगाया गया है। इसे पंचतत्व और मानव के पांच विकारों पर विजय का प्रतीक माना जाता है। महाशिवरात्रि से दो दिन पहले वर्ष में केवल एक बार पंचशूल को उतारकर विशेष पूजा-अर्चना और अभिषेक किया जाता है, जिसके बाद इसे पुनः स्थापित किया जाता है। मान्यता के साथ-साथ इसे वैज्ञानिक दृष्टि से प्रभावी तड़ित चालक भी माना जाता है।
105 किलोमीटर की कांवड़ यात्रा आस्था का प्रतीक
बिहार के भागलपुर जिले के सुल्तानगंज से देवघर तक 105 किलोमीटर लंबी कांवड़ यात्रा विश्व की सबसे बड़ी धार्मिक पदयात्राओं में गिनी जाती है। श्रद्धालु सुल्तानगंज में उत्तरवाहिनी गंगा से जल भरकर पैदल देवघर पहुंचते हैं और बाबा बैद्यनाथ का जलाभिषेक करते हैं। डाक बम, दांडी बम और खड़ी कांवड़ जैसे विभिन्न स्वरूपों में श्रद्धालु इस कठिन यात्रा को पूरी श्रद्धा और अनुशासन के साथ पूरा करते हैं।
श्रावणी मेला देता है अर्थव्यवस्था को नई गति
विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेले के दौरान 70 लाख से अधिक श्रद्धालु देवघर पहुंचते हैं, जबकि पूरे वर्ष यह संख्या करोड़ों तक पहुंच जाती है। इस धार्मिक आयोजन से स्थानीय व्यापार, होटल उद्योग, हस्तशिल्प, कांवड़ निर्माण, मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कारीगरों और छोटे व्यवसायियों को बड़ा आर्थिक संबल मिलता है। देवघर का प्रसिद्ध पेड़ा भी यहां आने वाले श्रद्धालुओं के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र रहता है।
दैनिक पूजा और दर्शन की विशेष व्यवस्था
मंदिर प्रबंधन समिति के अनुसार, प्रतिदिन सुबह 4 बजे मंदिर के पट खुलते हैं और मंगल आरती होती है। इसके बाद जलाभिषेक, षोडशोपचार पूजा और अभिषेक संपन्न होता है। दोपहर में भोग लगाया जाता है, जबकि शाम 6 बजे से साढ़े 7 बजे तक संध्या आरती और विशेष श्रृंगार पूजा आयोजित होती है, जिसमें हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं।
देवघर जेल से आता है बाबा का पुष्प नाग मुकुट
बाबा बैद्यनाथ के संध्या श्रृंगार की एक अनूठी परंपरा देवघर केंद्रीय कारागार से जुड़ी है। जेल के कैदी उपवास और धार्मिक नियमों का पालन करते हुए प्रतिदिन बाबा के लिए बेलपत्र और फूलों से विशेष नाग मुकुट तैयार करते हैं। यह परंपरा ब्रिटिश काल से चली आ रही है और आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। तैयार मुकुट को ‘बम भोले’ के जयकारों के बीच मंदिर पहुंचाया जाता है।
धार्मिक पर्यटन को मिल रही आधुनिक सुविधाएं
केंद्र सरकार ने भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय की प्रसाद योजना के तहत देवघर में धार्मिक पर्यटन को सुदृढ़ करने के लिए लगभग 40 करोड़ रुपए की लागत से विभिन्न विकास कार्य कराए हैं। कांवड़िया पथ का विकास, शिवगंगा तालाब का सौंदर्यीकरण, घाटों का उन्नयन और मंदिर परिसर के आसपास बुनियादी सुविधाओं का विस्तार किया गया है। इसके अलावा देवघर एयरपोर्ट, रेल संपर्क और एम्स की स्थापना से श्रद्धालुओं को बेहतर परिवहन और स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध हो रही हैं।







