धर्म

“गुरु ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने वाले सूर्य हैं, जिसका कोई गुरु नहीं उसका जीवन शुरू नहीं” — निर्यापक श्रमण मुनि श्री समता सागर जी महाराज

  • गुरु पूर्णिमा पर कुण्डलपुर में गुरु महिमा का भावपूर्ण गुणगान, आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का स्मरण

कुण्डलपुर (विश्व परिवार)। गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर विश्व वंदनीय संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के शिष्य आध्यात्म विद्या शिरोमणि आचार्य श्री समयसागर जी महाराज के आज्ञानुवर्ती कुण्डलपुर में विराजमान निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 समतासागर महाराज ने गुरु महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि गुरु ज्ञान के अथाह सागर को जन-जन के लिए सरल, सुपेय और जीवनोपयोगी बनाते हैं। जैसे सूर्य समुद्र के जल को वाष्प बनाकर बादलों के माध्यम से समस्त सृष्टि के लिए जीवनदायी वर्षा का कारण बनता है, उसी प्रकार सद्गुरु ज्ञान को आत्मसात कर लोककल्याण के लिए सहज और व्यवहारिक रूप में समाज तक पहुँचाते हैं।
राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन एवं प्रचारमंत्री जयकुमार जलज ने बताया कि गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर आयोजित धर्मसभा में मुनिश्री ने कहा कि भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सर्वोच्च है। गुरु केवल मार्गदर्शक नहीं, बल्कि अज्ञान का अंधकार दूर कर आत्मज्ञान का प्रकाश फैलाने वाले होते हैं।
अपने उद्बोधन में मुनिश्री ने सम्राट सिकंदर और दिगंबर आचार्य के ऐतिहासिक प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि जिसने अपने मन, इंद्रियों और इच्छाओं पर विजय प्राप्त कर ली, वही वास्तविक विजेता है। भारतीय गुरु परंपरा आत्मविजय और आत्मानुशासन का संदेश देती है, इसलिए यहाँ गुरु का स्थान सर्वोपरि माना गया है।
उन्होंने कहा कि भगवान महावीर, आचार्य कुंदकुंद, आचार्य शांतिसागर से होती हुई यह गौरवशाली परंपरा आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज तक पहुँची, जिन्होंने अपने तप, त्याग, ज्ञान और करुणा से संपूर्ण समाज को नई दिशा दी। उनका जीवन मूलाचार और समयसार का सजीव स्वरूप था तथा वे संपूर्ण मानवता के प्रेरणास्रोत थे।
मुनिश्री ने कुण्डलपुर बड़े बाबा मंदिर प्रकरण का उल्लेख करते हुए बताया कि जब सर्वोच्च न्यायालय में मंदिर से संबंधित महत्वपूर्ण मुकदमा चल रहा था, तब आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने केवल इतना आशीर्वाद दिया था— “बड़े बाबा का कार्य सत्य के साथ जुड़ा है, इसलिए सत्य की ही विजय होगी।” इसी विश्वास ने सभी को संबल प्रदान किया और अंततः सत्य की विजय हुई।
उन्होंने बताया कि मुकदमे की पैरवी करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता श्री गोपाल सुब्रमण्यम भी आचार्य श्री के दर्शन और आशीर्वाद के लिए नेमावर पहुँचे। भारतीय परंपरा के अनुसार उन्होंने श्रद्धापूर्वक वंदना की तथा अपनी पत्नी के अस्वस्थ होने की बात आचार्यश्री के समक्ष रखी। आचार्यश्री ने करुणामयी दृष्टि से आशीर्वाद देते हुए कहा, “जाओ, सब ठीक हो जाएगा।” कुछ समय बाद उनकी पत्नी के स्वास्थ्य में सुधार हुआ। इस अनुभव से प्रभावित होकर उन्होंने बड़े बाबा के कार्य को सेवा मानते हुए अपनी ओर से किसी प्रकार की फीस की अपेक्षा नहीं रखी।
मुनिश्री ने कहा कि संसार में धन लेने वाले अनेक गुरु मिल सकते हैं, लेकिन मन को जीतकर जीवन का रूपांतरण करने वाले सद्गुरु अत्यंत दुर्लभ होते हैं। सच्चा गुरु व्यक्ति के चित्त को निर्मल बनाकर उसे धर्म और आत्मकल्याण की दिशा में अग्रसर करता है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान पंचम काल में भी गुरु और मुनिराजों का सान्निध्य मिलना अत्यंत बड़ा सौभाग्य है। समाज रूपी नौका को संकटों से पार लगाने का सामर्थ्य सद्गुरुओं में ही निहित है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में एक योग्य गुरु का आश्रय ग्रहण कर उनके बताए मोक्षमार्ग पर चलना चाहिए।
अपने उद्बोधन का समापन करते हुए मुनिश्री ने आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की कृति मूक माटी का स्मरण करते हुए कहा कि जब हवा काम नहीं करती तो दवा काम करती है, और जब दवा भी काम नहीं करती, तब गुरु की दुआ और आशीर्वाद जीवन में चमत्कारिक परिवर्तन का कारण बन जाते हैं। उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से गुरु के प्रति श्रद्धा, समर्पण और विश्वास के साथ आत्मकल्याण के पथ पर निरंतर अग्रसर रहने का आह्वान किया। इस अवसर पर विद्याभवन में आयोजित गुरु पूर्णिमा महोत्सव समारोह में गुरु गौतम स्वामी की पूजन आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की पूजन ,108 दीपों से हुई महाआरती एवं निर्यापक श्रमण मुनिश्री समतासागर जी महाराज द्वारा भक्तों को मिला गुरु मंत्र।

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